समस्तीपुर: पूर्वी भारत के बागवानी क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिकों ने बिहार के जलोढ़ मैदानी इलाके में एवोकाडो की सफल खेती की है. वैज्ञानिकों ने इसके लिए विशेष पैकेज ऑफ प्रैक्टिस भी विकसित किया है. आईसीएआर-अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (एआईसीआरपी) फल के तहत मिली इस सफलता से बिहार में उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों की खेती की संभावनाएं बढ़ी हैं.
सितंबर 2023 में शुरू हुआ था एवोकाडो पर प्रयोग
विश्वविद्यालय ने सितंबर 2023 में एवोकाडो की खेती का परीक्षण शुरू किया था. इसका उद्देश्य यह पता लगाना था कि उत्तर बिहार के तापमान और आर्द्रता में होने वाले उतार-चढ़ाव के बीच एवोकाडो प्रजनन परिपक्वता हासिल कर सकता है या नहीं.
अब तक एवोकाडो को मुख्य रूप से कर्नाटक के कूर्ग और तमिलनाडु के कोडाइकनाल जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त माना जाता था. विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने बिहार के मैदानी क्षेत्र में इसकी खेती सफल कर इस धारणा को बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है.
अर्का सुप्रीम और अर्का रावी का किया अंतर-रोपण
एवोकाडो की जटिल फूल-जीवविज्ञान यानी डायकोगैमी की समस्या को दूर करने के लिए अनुसंधान दल ने टाइप-ए किस्म अर्का सुप्रीम को टाइप-बी किस्म अर्का रावी के साथ अंतर-रोपित किया. इसका उद्देश्य पर-परागण के लिए फूलों के खिलने का समय अनुकूल बनाना था.
एवोकाडो की जड़ें जलजमाव के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती हैं. इसे ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय ने मैदानी इलाकों के लिए विशेष प्रबंधन पैकेज तैयार किया. इसमें सपाट गड्ढों के बजाय ऊंची मेड़ या क्यारियों पर पौधरोपण को जरूरी किया गया. समय से पहले फल गिरने से रोकने के लिए ड्रिप सूक्ष्म सिंचाई और बेसिन मल्चिंग का भी उपयोग किया गया.
750 से 950 ग्राम तक के मिले फल
करीब ढाई साल पुराने बाग से मिले परिणाम उम्मीद से बेहतर रहे. अर्का सुप्रीम किस्म में 750 ग्राम से 950 ग्राम तक वजन वाले फल प्राप्त हुए. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इनका आकार बाजार में मिलने वाले सामान्य आयातित फलों से भी बड़ा है.
जैव-रासायनिक और संवेदी परीक्षणों में बिहार में उत्पादित एवोकाडो के स्वाद और मक्खन जैसी गुणवत्ता को आयातित उत्पाद के बराबर या बेहतर पाया गया.
किसानों के लिए खुलेंगे आय के नये अवसर
बाजार के लिहाज से एवोकाडो को उच्च मूल्य वाली फसल बताया जा रहा है. खेत पर इसका औसत भाव करीब 400 रुपये प्रति किलोग्राम बताया गया है, जबकि महानगरों के प्रीमियम खुदरा बाजार में इसकी कीमत 1500 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंचने की जानकारी दी गयी है.
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पीएस पाण्डेय ने इसे बिहार की कृषि के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया. उन्होंने कहा कि एवोकाडो को अब तक महत्वपूर्ण और उच्च आय वाली पहाड़ी फसल माना जाता था, लेकिन बिहार के मैदानी इलाके में इसकी खेती और वैज्ञानिक प्रबंधन पद्धति विकसित कर यह साबित हुआ है कि उच्च मूल्य वाले व्यावसायिक फल गंगा के मैदानों में भी उगाये जा सकते हैं.
उन्होंने कहा कि एवोकाडो की खेती बिहार के किसानों के लिए आर्थिक अवसर खोल सकती है और उच्च मूल्य वाली विविधीकृत बागवानी को बढ़ावा दे सकती है. अभी एवोकाडो का आयात किया जाता है. बिहार में इसका उत्पादन बढ़ने से आयात पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिल सकती है.
नियामक मूल्यांकन के बाद किसानों को मिलेंगे पौधे
आरपीसीएयू के फल वैज्ञानिक डॉ. आशीष पांडा ने कहा कि कुलपति के विशेष निर्देश पर मैदानी इलाके में एवोकाडो की खेती का प्रयोग किया गया, जिसमें उम्मीद से बेहतर सफलता मिली है.
विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार, नियामक मूल्यांकन और औपचारिक किस्म विमोचन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद किसानों को व्यावसायिक स्तर पर पौधों का वितरण शुरू किया जायेगा. विश्वविद्यालय के अनुसार, यह उपलब्धि बिहार में पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर उच्च मूल्य वाली बागवानी को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.
