पंखों पर थी नजर, हिल तो नहीं रही

रातभर करवटें बदल गुजारी रात, नींद ने नहीं दिया साथ समस्तीपुर : बीते 18 दिनों में रह रह कर आ रहे भूकंप के झटकों से उत्पन्न होने वाले दहशत ने लोगों के जेहन में जगह बना ली है. खास कर महिला व बच्चों में इसको लेकर खौफ अधिक देखा जा रहा है. भूकंप के डर […]

रातभर करवटें बदल गुजारी रात, नींद ने नहीं दिया साथ
समस्तीपुर : बीते 18 दिनों में रह रह कर आ रहे भूकंप के झटकों से उत्पन्न होने वाले दहशत ने लोगों के जेहन में जगह बना ली है. खास कर महिला व बच्चों में इसको लेकर खौफ अधिक देखा जा रहा है.
भूकंप के डर से कई लोगों ने मंगलवार की रात उचटती नींद सोकर ही सुबह किया. इस दौरान कई बार वे खुद भी भूकंप सा कंपन महसूस कर उठकर बैठते रहे तो देर रात तक बच्चों की चौकन्ना हुई निगाहें बार बार घर और दरवाजे की छत से लटक रहे पंखे पर फिरती रही. इसी क्रम में उन्हें कब आंख लग गयी पता नहीं चला. सुबह जगने पर थोड़ा सुकून तो महसूस किया लेकिन चर्चा ने विराम नहीं लिया. घर के बड़े बुजुर्गो के पास बैठ कर इस प्राकृतिक आपदा की चर्चा करते रहे. इसके परिणाम और बचाव के उपायों को अपनी व बुजुर्गो की निगाहों से ढूंढ कर सामने लाते रहे. इसमें हिस्सा लेते हुए बुजुर्ग पूर्व की घटनाओं का जिक्र कर बच्चों का हौसला बढाने का प्रयास करते रहे.
शहर से करीब 10 किलो मीटर दूर पूसा प्रखंड के चंदौली पंचायत अंतर्गत मुजौना गांव की निर्मला देवी अपने 10 वर्षीय पोते संभव को बता रही थी कि वर्ष 1934 में वह पैदा नहीं हुई थी क्योंकि उसकी मां कामेश्वरी देवी खुद 13 वर्ष की रही होगी. अपनी मां की जुबानी सुनी थी कि 1934 का भूकंप प्रलयंकारी था.
उस दिन उनकी मां अपने गांव टभका पंडित टोल से अपनी मां और अन्य परिजनों के साथ गंगा स्नान करने सिमरियाघाट गयी थी.
उसने बताया था कि उस वर्ष भी भूकंप के झटके बहुत दिनों तक आते रहे थे. उस बार पहला झटका इतना तीव्र था कि कई जगह जमीन पर दरारें आ गयी तो कई स्थानों पर बालू के ढेर लग गये थे. कहीं कहीं से तो आग जैसा पदार्थ फूटने की भी बात बतायी थी. ऐसा फिर नहीं हुआ. हां 1988 ई. में जब भूकंप आया था तो वह खुद लहेरियासराय के बेलबागंज मोहल्ला में थी. मकान गिरा था. लेकिन सभी बच्चे सकुशल बच गये. उस वक्त मोहल्ले के ही देवनारायण गोस्वामी के पुत्र निरंजन गोस्वामी जो अब पटना में ही शिफ्ट कर गये हैं उन्होंने आंगन में चापाकल धंसवाया था.
भूकंप के दौरान उसके चापाकल के बगल से इतना पानी और उजला बालू निकला कि ढेर सा लग गया था. इसके बाद तो हल्के-फुल्के झटके दो वर्ष पहले और गत वर्ष भी महसूस हुए. लेकिन इस बार 25 अप्रैल से लेकर अब तक आये झटके से वह भी थोड़ा सहम गयी है. लेकिन प्रकृति का यह चक्र है. धीरे धीरे धरती शांत हो जायेगी. क्योंकि लोगों में अब भी भगवान के प्रति आस्था है. वह समय के साथ सब कुछ ठीक कर देगा.

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