Ugratara Mahotsav Mahishi: कोसी के किनारे बसे एक गांव की पहचान आज केवल एक प्राचीन मंदिर या ऐतिहासिक स्थल तक सीमित नहीं रह गयी है. महिषी अब संस्कृति, दर्शन, इतिहास और कला के बड़े मंच के रूप में भी पहचाना जाने लगा है. इसके पीछे सबसे बड़ी भूमिका श्री उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव की है, जो वर्ष 2012 से लगातार आयोजित हो रहा है.
पर्यटन विभाग, बिहार सरकार के तत्वावधान में होने वाले इस त्रिदिवसीय महोत्सव ने पिछले वर्षों में महिषी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को गांव की सीमाओं से निकालकर राष्ट्रीय फलक तक पहुंचाने का काम किया है. यहां देवी उग्रतारा का प्रसिद्ध सिद्धपीठ मंदिर है. यही वह धरती है, जिसे महान मीमांसक पंडित मंडन मिश्र की जन्मस्थली और आदि शंकराचार्य के साथ ऐतिहासिक शास्त्रार्थ की भूमि के रूप में भी जाना जाता है.
आज इसी विरासत के बीच देश के नामचीन कलाकारों की प्रस्तुतियां होती हैं और देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के विद्वान भारतीय दर्शन और ज्ञान परंपरा पर चर्चा करते हैं.
एक पहल से शुरू हुआ महोत्सव का सफर
श्री उग्रतारा महोत्सव की कहानी वर्ष 2011 से शुरू होती है. तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सेवा यात्रा के दौरान श्री उग्रतारा न्यास समिति के तत्कालीन उपाध्यक्ष प्रमिल कुमार मिश्र के विशेष आमंत्रण पर मुख्यमंत्री महिषी पहुंचे थे.
इसी दौरान उन्होंने अधिकारियों को महिषी में हर वर्ष उग्रतारा महोत्सव आयोजित करने का निर्देश दिया. इसके बाद वर्ष 2012 में नवरात्र के अवसर पर श्री उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव की विधिवत शुरुआत हुई.
यह अपने आप में एक खास पहल थी, क्योंकि प्रदेश में पहली बार किसी गांव में पर्यटन विभाग की ओर से इस स्तर का सांस्कृतिक आयोजन शुरू किया गया था.
जब गांव के लोगों ने पहली बार देखा राष्ट्रीय मंच
महिषी और आसपास के ग्रामीणों के लिए शुरुआती दौर में यह आयोजन किसी आश्चर्य से कम नहीं था. पूर्वी कोसी तटबंध से सटे इस इलाके के कई लोगों ने कभी अपने गांव या आसपास के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों को प्रत्यक्ष प्रस्तुति देते नहीं देखा था.
महोत्सव ने यह दूरी कम की.
जो सांस्कृतिक कार्यक्रम सामान्य तौर पर राजधानी या बड़े शहरों तक सीमित रहते थे, वे अब महिषी के ग्रामीण परिवेश में होने लगे. गांव के लोग अपने घर के करीब देश के चर्चित कलाकारों को सुनने और देखने लगे.
इससे सिर्फ मनोरंजन का अवसर नहीं मिला, बल्कि ग्रामीण समाज में सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना का भी विस्तार हुआ.
खुले मैदान से भव्य स्टेडियम तक पहुंचा आयोजन
महोत्सव के साथ महिषी में आधारभूत सुविधाओं का विकास भी जुड़ता चला गया. मुख्य आयोजन विशाल राजकमल क्रीड़ा मैदान में होता रहा है.
कभी खुले मैदान के रूप में इस्तेमाल होने वाला यह स्थल अब एक सुंदर स्टेडियम का रूप ले चुका है. यहां बाउंड्री वॉल, कंक्रीट का भव्य मंच, बड़े प्रवेश द्वार और वाशरूम जैसी सुविधाएं विकसित की गयी हैं.
कई अन्य कार्य अभी प्रक्रियाधीन हैं.
इस तरह उग्रतारा महोत्सव सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन नहीं रहा. इसके बहाने स्थानीय स्तर पर आधारभूत संरचना के विकास को भी गति मिली और आयोजन स्थल ने धीरे-धीरे स्थायी रूप लेना शुरू किया.
अनूप जलोटा से शारदा सिन्हा तक सजे मंच
उग्रतारा महोत्सव की पहचान इसकी सांस्कृतिक विविधता से भी बनी है. यह केवल धार्मिक आयोजन बनकर नहीं रह गया.
महोत्सव के मंच पर अनूप जलोटा, पद्म विभूषण शारदा सिन्हा, पद्मश्री मालिनी अवस्थी, चंदन दास, विक्रम राठौड़ समेत अनेक नामचीन कलाकार अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं.
इन कलाकारों को सुनने के लिए कोसी क्षेत्र के लोगों को बड़े शहरों का रुख नहीं करना पड़ा. महिषी की धरती पर ही राष्ट्रीय स्तर की प्रस्तुतियां देखने का अवसर मिला.
यही वजह है कि महोत्सव स्थानीय लोगों के लिए धीरे-धीरे सालाना सांस्कृतिक आकर्षण बनता गया.
जहां संगीत के साथ दर्शन पर भी होती है बहस
उग्रतारा महोत्सव की सबसे अलग पहचान इसका बौद्धिक पक्ष है. मंडन धाम में आयोजित होने वाला राष्ट्रीय सेमिनार महोत्सव को सामान्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों से अलग पहचान देता है.
जिस धरती को मंडन मिश्र और शंकराचार्य के ऐतिहासिक शास्त्रार्थ से जोड़ा जाता है, उसी भूमि पर भारतीय दर्शन और ज्ञान परंपरा को लेकर गंभीर विमर्श होता है.
सेमिनार में देवी उग्रतारा, मंडन मिश्र की कृतियों, शंकराचार्य के विभिन्न मतों, मिथिला संस्कृति और भारतीय दर्शन सहित कई विषयों पर चर्चा होती है.
जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी, साउथ बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान और कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय समेत देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों के विद्वान इसमें शामिल होते रहे हैं.
इससे महिषी की पहचान केवल धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि गंभीर बौद्धिक विमर्श की भूमि के रूप में भी मजबूत हुई है.
स्मारिका में सिर्फ तस्वीरें नहीं, दर्ज है शोध
महोत्सव की स्मारिका भी इसकी अलग पहचान है. यह केवल कार्यक्रम में शामिल कलाकारों या आयोजनों की याद संजोने वाली पुस्तिका नहीं है.
इसमें महिषी, देवी उग्रतारा, मंडन मिश्र, मिथिला संस्कृति और भारतीय दर्शन से जुड़े शोधपरक आलेख प्रकाशित होते रहे हैं.
इस तरह महोत्सव से जुड़ी सामग्री भविष्य के लिए दस्तावेज के रूप में भी संरक्षित हो रही है. आने वाली पीढ़ियों के लिए यह महिषी की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है.
गांव में पहुंची सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना
करीब डेढ़ दशक के सफर में महोत्सव का प्रभाव आयोजन स्थल से बाहर भी दिखाई देने लगा है.
ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों को राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों और विद्वानों से सीधे जुड़ने का मौका मिला. स्थानीय युवाओं और विद्यार्थियों के लिए भी यह अपने क्षेत्र की विरासत को नये नजरिये से समझने का अवसर बना.
महिषी की ऐतिहासिक पहचान को मंच मिलने से स्थानीय लोगों में अपनी विरासत को लेकर गौरव की भावना भी मजबूत हुई है.
हालांकि, इस विरासत को स्थायी पर्यटन केंद्र में बदलने के लिए महोत्सव के साथ बेहतर परिवहन, ठहरने की सुविधा, विरासत स्थलों का संरक्षण और नियमित पर्यटन गतिविधियों पर भी ध्यान देना जरूरी होगा.
धार्मिक आस्था से आगे बनी इतिहास और संस्कृति की पहचान
महिषी पहले से ही देवी उग्रतारा के सिद्धपीठ के कारण श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण रहा है. मंडन मिश्र और शंकराचार्य की परंपरा ने इसे दार्शनिक और ऐतिहासिक महत्व भी दिया है.
उग्रतारा महोत्सव ने इन सभी पहचान को एक साझा मंच दिया.
आज महिषी में धर्म के साथ इतिहास, दर्शन, साहित्य, लोक संस्कृति और कला का संगम दिखाई देता है. यही महोत्सव की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है.
Ugratara Mahotsav Mahishi: राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्र पर मजबूत हुई महिषी की जगह
2012 में शुरू हुआ यह आयोजन अब महिषी की पहचान का हिस्सा बन चुका है. एक ग्रामीण क्षेत्र में लगातार होने वाला यह महोत्सव बताता है कि बड़े सांस्कृतिक और बौद्धिक आयोजन केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहने चाहिए.
यदि महिषी की ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण, पर्यटन सुविधाओं का विस्तार और महोत्सव की निरंतरता साथ-साथ आगे बढ़ती है, तो यहां धार्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक और विरासत पर्यटन की संभावनाएं भी मजबूत हो सकती हैं.
उग्रतारा महोत्सव ने गांव को मंच दिया, मंच ने कलाकारों और विद्वानों को यहां तक पहुंचाया और इस पूरे सफर ने महिषी को एक नयी पहचान दी. अब चुनौती इस पहचान को स्थायी सांस्कृतिक और पर्यटन विरासत में बदलने की है.
