रोजाना हजारों मजदूर का पंजाब की ओर हो रहा पलायन

रोजाना हजारों मजदूर का पंजाब की ओर हो रहा पलायन

हजारों की संख्या में मौजूद मजदूर ट्रेन में चढ़ने के लिए करने लगते हैं धक्का-मुक्की सिमरी बख्तियारपुर. इन दिनों पूर्णिया कोर्ट-अमृतसर जनसेवा एक्सप्रेस के द्वारा बड़ी संख्या में मजदूरों का पलायन जारी है. हर दिन ट्रेन पर चढ़ने के लिए विभिन्न स्टेशनों पर अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है. हजारों की संख्या में मौजूद मजदूर ट्रेन में चढ़ने के लिए धक्का-मुक्की करने लगते हैं. कई यात्री दरवाजे के रास्ते तो कुछ लोग खिड़की के रास्ते अंदर जाने की कोशिश करते नजर आते हैं. रविवार को भी भीड़ इतनी ज्यादा थी कि महिलाओं और बच्चों को सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ी. कई लोग ट्रेन छूटने के डर से जान जोखिम में डालकर दरवाजे पर लटकते नजर आये. ऐसे हालात में किसी भी बड़े हादसे की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता. मिली जानकारी के मुताबिक पंजाब में धान कटाई के मौसम के कारण सहरसा, सुपौल, मधेपुरा और आसपास के जिलों से रोजाना हजारों मजदूर पंजाब की ओर जा रहे हैं. लेकिन रेलवे द्वारा न तो अतिरिक्त कोच की व्यवस्था की गयी है और न ही कोई स्पेशल ट्रेन चलाई गयी है. इससे यात्रियों की परेशानी और बढ़ गयी है. यात्रियों का आरोप है कि टिकट लेने के बाद भी उन्हें ट्रेन में जगह नहीं मिलती. रेलवे सिर्फ राजस्व वसूलने में लगा है, जबकि सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं है. पलायन की पटरी पर जिंदगी जनसेवा एक्सप्रेस की भीड़ सिर्फ यात्रियों की नहीं, बल्कि टूटती उम्मीदों की कहानी है. कोसी-सीमांचल से निकलते मजदूर यह बता रहे हैं कि गांव में रोजगार की हालत कितनी खराब है. घर-परिवार छोड़कर सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना उनकी मजबूरी है, पसंद नहीं. हर साल बढ़ती भीड़ के बावजूद रेलवे की तैयारी हर बार फेल साबित होती है. जनसेवा एक्सप्रेस में न अतिरिक्त कोच जुड़ते हैं, न स्पेशल ट्रेन चलती है. नतीजा यह है कि प्लेटफॉर्म पर अफरातफरी और ट्रेन में जानलेवा भीड़ रहती है. मजदूर पूछते हैं कि क्या रेलवे को पहले से इस भीड़ का अंदाजा नहीं रहता. या फिर जानबूझकर अनदेखी की जाती है. यात्रियों से पूरा किराया लिया जाता है, लेकिन बदले में अव्यवस्था मिलती है. यह स्थिति साफ बताती है कि योजना और प्रबंधन दोनों ही पटरी से उतर चुके हैं. हादसे का इंतजार कब तक जनसेवा एक्सप्रेस में ओवरक्राउडिंग अब आम बात हो गयी है, लेकिन यह सामान्य नहीं, खतरनाक है. दरवाजे पर लटकते यात्री, अंदर ठसाठस भीड़ रहती है. जिस कारण हर पल हादसे का खतरा बना रहता है. बावजूद इसके सुरक्षा व्यवस्था नदारद है. मजदूरों में गुस्सा साफ दिखता है. वे पूछते हैं कि क्या बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है. जब तक कोई बड़ी घटना नहीं होती, तब तक व्यवस्था की नींद नहीं टूटती यही सबसे बड़ा खतरा है.

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लेखक के बारे में

By Dipankar shriwastaw

दीपांकर श्रीवास्तव प्रिंट माध्यम में 20 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत दैनिक जागरण से की. अभी प्रभात खबर के सहरसा कार्यालय में काम कर रहे हैं. शिक्षा, अनुसंधान, कला-संस्कृति व सिनेमा में रुचि रखते हैं.

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