जारों में भरकर घर-घर पहुंच रहा ‘मीठा जहर’

शहर हो या गांव, घर-घर पानी के रूप में धीमा जहर पहुंच रहा है और लोग अनजाने में इसका शिकार बन रहे हैं.

प्लास्टिक के जार में सप्लाई किया जा रहा पानी बन रहा लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा

आरओ वाटर के नाम पर घरों और दुकानों तक पहुंचाया जा रहा ट्यूबवेल का पानी

सहरसा. शहर हो या गांव, घर-घर पानी के रूप में धीमा जहर पहुंच रहा है और लोग अनजाने में इसका शिकार बन रहे हैं. प्लास्टिक के जार में शुद्ध पानी के नाम पर सप्लाई किया जा रहा पानी लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बनता जा रहा है. शादी-विवाह से लेकर छोटे-बड़े आयोजनों तक में जार के पानी की मांग बढ़ गयी है, लेकिन इसकी गुणवत्ता पर किसी का ध्यान नहीं है. जिला मुख्यालय में लगभग 25 से 30 वाटर प्लांट संचालित हो रहे हैं. इनमें से अधिकांश के पास न तो वैध रजिस्ट्रेशन है और न ही पानी की गुणवत्ता जांचने की कोई व्यवस्था. संचालकों द्वारा अपने स्तर पर ट्यूबवेल लगाकर सीधे जारों में पानी भरकर आरओ वाटर के नाम पर घरों और दुकानों तक पहुंचाया जा रहा है. यही स्थिति कमोबेश राज्य के अन्य शहरों में भी बनी हुई है.

अवैध वाटर प्लांटों पर कार्रवाई नहीं

जानकारी के अनुसार, कई वाटर प्लांटों ने पीएचईडी से आवश्यक कनेक्शन तक नहीं लिया है. प्लांटों में पानी की जांच के लिए लैब होना अनिवार्य माना जाता है, लेकिन अधिकांश जगहों पर न तो टेस्टिंग लैब है और न ही पानी में क्लोरीन की निर्धारित मात्रा मिलाई जा रही है. शहर में चल रहे इन प्लांटों की जानकारी जिला प्रशासन के पास भी स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है. पीएचईडी और स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर भी इनके रजिस्ट्रेशन और निगरानी की समुचित व्यवस्था नहीं दिख रही है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर लोगों तक पहुंच रहे इस पानी की गुणवत्ता की जिम्मेदारी कौन लेगा. विशेषज्ञों के अनुसार, पानी में क्लोरीन की कमी और टीडीएस की अधिक मात्रा से पथरी सहित कई स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. अधिक टीडीएस वाला पानी दांतों और शरीर के अन्य अंगों पर भी प्रतिकूल असर डाल सकता है.

गर्मी शुरू होते ही बढ़ जाते हैं दाम

गर्मी बढ़ते ही जार के पानी की कीमतों में भी बढ़ोतरी कर दी जाती है. इसके बावजूद लोगों को शुद्ध और मानक के अनुरूप पानी नहीं मिल पाता. सरकारी कार्यालयों से लेकर निजी संस्थानों तक में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में जार का पानी पहुंचाया जा रहा है. जानकारों के मुताबिक पानी में टीडीएस 1500 से कम होना चाहिए. एक लाख लीटर पानी में करीब 250 ग्राम क्लोरीन की मात्रा आवश्यक मानी जाती है. यदि पानी संग्रहित है तो उसमें दो पीपीएम क्लोरीन होना जरूरी है.

जांच व्यवस्था नहीं

गर्मी के दिनों में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जार का पानी सप्लाई किया जा रहा है, लेकिन इसकी नियमित जांच की कोई व्यवस्था नहीं है. स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि शिकायत मिलने पर सैंपल जांच की कार्रवाई की जायेगी, जबकि पीएचईडी की ओर से भी रजिस्ट्रेशन और निगरानी को लेकर कोई ठोस पहल नहीं दिख रही है. इसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है.

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