सहरसा. इन दिनों गेंहू कटनी के बाद खेतों में गेंहू के बचे पराली जलाने की सख्त रूप से मनाही है. इसको लेकर कृषि विभाग किसानों को सख्त हिदायत के साथ निगरानी भी कर रही है. पराली जलाने से जहां मिट्टी की उर्वरता कम होती है, वहीं पर्यावरण पर भी असर पड़ता है. जिसको लेकर कृषि विज्ञान केंद्र अगवानपुर के वैज्ञानिकों ने किसानों से फसल कटाई के बाद बचे अवशेषों को नहीं जलाने की पुरजोर अपील की है. वैज्ञानिकों का कहना है कि जिसे किसान कचरा समझकर जला देते हैं, उसे वहीं मिला दें तो वह वास्तव में मिट्टी के लिए सोना है. इसे जलाने से ना केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी हमेशा के लिए खत्म हो सकती है. जिला कृषि पदाधिकारी ने बताया कि अक्सर देखा जा रहा है कि किसानों द्वारा मजदूरों के अभाव में फसलों विशेषकर गेहूं फसलों की कटाई के बाद अगली फसल की बुआई के लिए खेतों में अवशेष फसल को जला देने के कारण मिट्टी में उपलब्ध सूक्ष्म जीवाणु केंचुआ जल कर नष्ट हो जाते हैं एवं मिट्टी में उपलब्ध जैविक कार्बन समाप्त हो जाते हैं. जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति में ह्रास होता है. वहीं दूसरी ओर अगली फसल की उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ता है. साथ ही वातावरण में धुआं फैलने से पर्यावरण दूषित होने की संभावना बनी रहती है. फसल अवशेष जलाने की घटना की रोकथाम के लिए राज्य सरकार द्वारा कृषि विभाग के किसान सलाहकार, कृषि समन्वयक, सहायक तकनीकी प्रबंधक, प्रखंड तकनीकी प्रबंधक के द्वारा किसान चौपाल के माध्यम से अधिकाधिक किसानों को जागरूक किया जा रहा है.
पराली जलाने पर किसान तीन वर्षों तक कृषि योजना से होंगे वंचित
इन दिनों गेंहू कटनी के बाद खेतों में गेंहू के बचे पराली जलाने की सख्त रूप से मनाही है. इसको लेकर कृषि विभाग किसानों को सख्त हिदायत के साथ निगरानी भी कर रही है.
