पराली जलाने पर किसान तीन वर्षों तक कृषि योजना से होंगे वंचित

इन दिनों गेंहू कटनी के बाद खेतों में गेंहू के बचे पराली जलाने की सख्त रूप से मनाही है. इसको लेकर कृषि विभाग किसानों को सख्त हिदायत के साथ निगरानी भी कर रही है.

सहरसा. इन दिनों गेंहू कटनी के बाद खेतों में गेंहू के बचे पराली जलाने की सख्त रूप से मनाही है. इसको लेकर कृषि विभाग किसानों को सख्त हिदायत के साथ निगरानी भी कर रही है. पराली जलाने से जहां मिट्टी की उर्वरता कम होती है, वहीं पर्यावरण पर भी असर पड़ता है. जिसको लेकर कृषि विज्ञान केंद्र अगवानपुर के वैज्ञानिकों ने किसानों से फसल कटाई के बाद बचे अवशेषों को नहीं जलाने की पुरजोर अपील की है. वैज्ञानिकों का कहना है कि जिसे किसान कचरा समझकर जला देते हैं, उसे वहीं मिला दें तो वह वास्तव में मिट्टी के लिए सोना है. इसे जलाने से ना केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी हमेशा के लिए खत्म हो सकती है. जिला कृषि पदाधिकारी ने बताया कि अक्सर देखा जा रहा है कि किसानों द्वारा मजदूरों के अभाव में फसलों विशेषकर गेहूं फसलों की कटाई के बाद अगली फसल की बुआई के लिए खेतों में अवशेष फसल को जला देने के कारण मिट्टी में उपलब्ध सूक्ष्म जीवाणु केंचुआ जल कर नष्ट हो जाते हैं एवं मिट्टी में उपलब्ध जैविक कार्बन समाप्त हो जाते हैं. जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति में ह्रास होता है. वहीं दूसरी ओर अगली फसल की उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ता है. साथ ही वातावरण में धुआं फैलने से पर्यावरण दूषित होने की संभावना बनी रहती है. फसल अवशेष जलाने की घटना की रोकथाम के लिए राज्य सरकार द्वारा कृषि विभाग के किसान सलाहकार, कृषि समन्वयक, सहायक तकनीकी प्रबंधक, प्रखंड तकनीकी प्रबंधक के द्वारा किसान चौपाल के माध्यम से अधिकाधिक किसानों को जागरूक किया जा रहा है.

अवशेषों को जलाने के बजाय मिट्टी में ही मिलाएं

केंद्र के वरीय वैज्ञानिक डॉ सुनीता पासवान ने बताया कि फसल अवशेष जलाने से मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव एवं कार्बनिक पदार्थ नष्ट हो जाते हैं. इससे वायु प्रदूषण तो फैलता ही है, साथ ही लंबे समय में खेत की उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. मिट्टी अपनी प्राकृतिक नमी एवं उपजाऊ पन खोने लगती है. उन्होंने कहा कि हैप्पी सीडर जैसी मशीनों का उपयोग कर अगली फसल की बुआई करने से ये अवशेष सड़कर प्राकृतिक खाद बन जाते हैं. इससे मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश की मात्रा बढ़ती है. उन्होंने बताया कि इस विधि से अगली फसल में रासायनिक उर्वरकों की लागत 15 से 20 प्रतिशत तक कम हो जाती है. उन्होंने किसानों से आग्रह किया है कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य एवं खेत की सेहत के लिए अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें मिट्टी में ही मिलायें.

पराली जलाने पर बंद कर दिया जायेगा किसान रजिस्ट्रेशन

जिला के कृषि पदाधिकारी संजय कुमार ने कहा कि पराली नहीं जलाने के लिए किसानों को निर्देश दिया गया है. जितने भी कंबाइंड हार्वेस्टर के मालिक हैं, उससे शपथ पत्र लिए जाने का निर्देश दिया गया है. कोई पराली जलाता है तो किसान रजिस्ट्रेशन को बंद कर दिया जायेगा एवं वे तीन साल तक किसी भी कृषि योजना का लाभ नहीं ले सकेंगे. उन्होंने कहा कि जिले में पराली जलाने की घटना अब तक प्रतिवेदित नहीं है. इस जिले में पराली का उपयोग किसान अपने मवेशियों को चारा के रूप में करते हैं. इसलिए पराली जलाने की घटना नहीं होती है. फिर भी किसी किसान के द्वारा पराली जलाए जाने की घटना सामने आती है तो उन्हें कृषि विभाग की जानेवाली योजनाओं से तीन वर्ष के लिए वंचित कराया जायेगा.

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By Dipankar Shriwastaw

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