बागमती रेल हादसा : 45 वर्षों के बाद भी जख्म है शेष, चली गयी थी हजारों जानें

छह जून 1981 का वह मनहूस दिन आज भी कोसी और सीमांचल क्षेत्र के लोगों के जेहन में ताजा है. आज से 45 वर्ष पहले हुए बागमती रेल हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था.

रेल हादसे में 416 डाउन पैसेंजर ट्रेन की सात बोगियां बागमती नदी में समा गयी थीं

आज भी रूह कंपा देती है देश की सबसे भयावह रेल त्रासदी

आयुष गुप्ता, सिमरी बख्तियारपुर

छह जून 1981 का वह मनहूस दिन आज भी कोसी और सीमांचल क्षेत्र के लोगों के जेहन में ताजा है. आज से 45 वर्ष पहले हुए बागमती रेल हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. मानसी से सहरसा आ रही 416 डाउन पैसेंजर ट्रेन की सात बोगियां बदला घाट और धमारा घाट के बीच बागमती नदी में समा गयी थी. यह दुर्घटना भारतीय रेल इतिहास की सबसे बड़ी और दुनिया की सबसे भयावह रेल त्रासदियों में गिनी जाती है. घटना के समय ट्रेन यात्रियों से खचाखच भरी हुई थी. शादी-विवाह का मौसम होने के कारण डिब्बों के भीतर, दरवाजों पर और छत तक यात्रियों की भीड़ थी.

मातम में बदल गयी थी सैकड़ों परिवारों की खुशियां

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, अचानक मौसम खराब हो गया. तेज आंधी और मूसलाधार बारिश के बीच ट्रेन पुल संख्या 51 के समीप पहुंची और कुछ ही क्षणों में उसके कई डिब्बे बागमती नदी में जा गिरे. हादसे के बाद चारों ओर चीख-पुकार मच गयी और देखते ही देखते सैकड़ों परिवारों की खुशियां मातम में बदल गयी. इस हादसे के कारणों को लेकर आज भी रहस्य बरकरार है. एक चर्चा के अनुसार पुल पर आए भैंस को बचाने के प्रयास में चालक द्वारा ब्रेक लगाने से ट्रेन पटरी से उतर गयी थी. वहीं दूसरी और अधिक चर्चित थ्योरी यह है कि तेज तूफान और बारिश के दौरान यात्रियों द्वारा खिड़कियां बंद कर देने से हवा का दबाव बढ़ा और ट्रेन असंतुलित होकर नदी में जा गिरी. स्थानीय बुजुर्ग आज भी दूसरी थ्योरी को अधिक विश्वसनीय मानते हैं, हालांकि रेलवे की ओर से कोई अंतिम निष्कर्ष कभी सामने नहीं आ सका. दुर्घटना में मृतकों की वास्तविक संख्या भी आज तक विवाद का विषय बनी हुई है. सरकारी आंकड़ों में मौतों की संख्या सैकड़ों बताई गयी, जबकि स्थानीय लोगों और गैरसरकारी अनुमानों में यह संख्या हजार से अधिक मानी जाती है.

कई सप्ताह तक नदी से निकलते रहे शव, लगातार होते रहे अंतिम संस्कार

ग्रामीण बताते हैं कि हादसे के बाद कई सप्ताह तक नदी से शव निकलते रहे और बागमती किनारे लगातार अंतिम संस्कार होते रहे. बड़ी संख्या में लोग ऐसे भी थे जिनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं बन सका. हादसे के बाद सेना, नौसेना, प्रशासन और स्थानीय लोगों ने मिलकर बड़े पैमाने पर राहत एवं बचाव अभियान चलाया. घटनास्थल के आसपास कई दिनों तक हेलीकॉप्टरों की आवाजाही जारी रही. गोताखोरों ने नदी में उतरकर शवों और घायलों की तलाश की. बताया जाता है कि प्रशासन ने प्रत्येक शव निकालने पर पारिश्रमिक देने की घोषणा की थी, लेकिन कई गोताखोरों ने मानवीय संवेदना का परिचय देते हुए पैसे लेने से इनकार कर दिया था. 45 वर्ष बीत जाने के बाद भी बागमती रेल हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के दर्द, बिछड़न और त्रासदी की ऐसी कहानी है, जिसे समय भी मिटा नहीं सका. आज भी जब छह जून की तारीख आती है तो बागमती के किनारे उस भयावह शाम की यादें लोगों की आंखों को नम कर देती हैं.

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