दुर्गापूजा . सोनवर्षा स्टेट के महाराजा ने सैकड़ों वर्ष पूर्व स्थापित की थी दुर्गा की प्रतिमा
सोनवर्षा में िकया जानेवाला विधि विधान दरभंगा ड्योढ़ी व गढ़बनैली स्टेट के अतिरिक्त अन्य जगह नहीं अपनायी जाती है. पूजा का संपूर्ण विधान पंडित तारानंद झा द्वारा वर्ष 1890 में प्रकाशित पुस्तक के अनुसार की जाती है. पुस्तक में राशि के हिसाब से दस दिनों का िवधान है़
सोनवर्षाराज : सोनवर्षा स्टेट के महाराजा स्व हरिवल्लभ नारायण सिंह द्वारा सैकड़ों वर्ष पूर्व स्थापित की गयी मां दुर्गा की पूजा अर्चना वैदिक व तांत्रिक दोनों विधि से की जाती है.
पूजा के विधि विधान के बाबत विस्तार से जानकारी देते हुए पंडित भगवान मिश्र बताते हैं कि सोनवर्षा में की जाने वाली विधि विधान दरभंगा ड्योढ़ी व गढ़बनैली स्टेट के अतिरिक्त अन्य जगह नहीं अपनायी जाती है. पूजा का संपूर्ण विधान पंडित तारानंद झा द्वारा वर्ष 1890 में प्रकाशित पुस्तक के अनुसार की जाती है. जिसमें राशि के हिसाब से पूजा के दस दिनों का विधान अंकित है.
पूजा के दस दिनों तक वैदिक रीति तथा रात्रि में पूजा का विधान पूर्णत: तांत्रिक विधि से होता है. वैदिक विधान में देवी को सात्विक भोग, जबकि तांत्रिक विधि के अनुसार निशा पूजा की रात छप्पन भोग में मछली व मदिरा भी चढ़ायी जाती है. निशा पूजा की रात में छागर का बलि प्रदान प्रारंभ होता है. जिसकी संख्या नवमीं खत्म होते होते हजारों में हो जाती है.
महाराजा स्व हरिवल्लभ नारायण सिंह द्वारा बेहट ड्योढ़ी से मां दुर्गा को सोनवर्षा लाकर स्थापित किया गया था. बेहट से प्रत्येक कदम पर एक छागर की बलि देते हुए सोनवर्षा तक लाया गया. यहां जो भी मनोकामना मांगी जाती है, अवश्य पूर्ण होती है. सबसे बड़ी खासियत है कि बलि प्रदान सोनवर्षा के स्व किरपाली सिंह के परिवार के द्वारा ही अब तक किया जा रहा है. साथ ही बली प्रदान बायें हाथ से किया जा रहा है.
