विकास की राह रोक कर कैसे होगा विकास?
पलट गये स्थानीय विधायक भी
चालू विधानसभा सत्र में ही स्थानीय विधायक अरुण कुमार ने अपनी पहली आवाज बैजनाथपुर पेपरमिल को लेकर ही उठायी थी. उन्होंने कहा था कि कोसी पिछड़ा इलाका है. यहां बेरोजगारी की बड़ी समस्या है. बैजनाथपुर में लगभग 40 साल पूर्व ही पेपरमिल की स्थापना हुई थी. लेकिन आज तक उसे चालू नहीं किया जा सका है. मिल के चालू हो जाने से कोसी क्षेत्र के हजारों लोगों को रोजगार मिल सकता है. लेकिन सत्र समाप्त भी नहीं हुआ और विधायक जी एम्स के लिए सरकार को पेपरमिल की जमीन दिखाने वाले आवेदन पर हस्ताक्षर कर अपनी ही बातों से पलट गए.
परियोजना पूरा होने से लाभ
स्थानीय स्तर पर कच्चे माल का होगा उत्पादन, जिससे किसान और युवाओं को मिलेगा रोजगार
मिल चालू होने पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 25 हजार लोग होंगे लाभान्वित
राज्य में उत्पादन से ज्यादा होती है पेपर की खपत, मिल चालू होने पर यहां से होगा पेपर का निर्यात
यहां उत्पादन शुरू होने से सरकार को भी मिलेगा लगभग 5 करोड़ रुपये का राजस्व
कोसी क्षेत्र का पहला उद्योग होने के नाते कई और उद्योग के लिए बन सकता है प्रेरणादायी
कोसी से प्रत्येक वर्ष हजारों लोगों के पलायन पर लग सकता है विराम
दस विधायकों ने विधानसभा सचिव को हस्ताक्षरित आवेदन देकर बताया है कि पेपरमिल बंद होने से 45 एकड़ सरकारी जमीन बेकार पड़ी है. लेकिन इन विधायकों की चाहत होती, तो मिल धुआं उगल रहा होता. हजारों हाथों को रोजगार मिलता. किसानों को कच्चे माल की कीमत मिलती. जिला समृद्ध होता.
सहरसा मुख्यालय :बिहार सरकार के पूर्व उद्योग मंत्री सिमरी बख्तियारपुर के विधायक दिनेश चंद्र यादव ने विधानसभा सचिव को आवेदन देते बताया है कि सहरसा उत्तर बिहार के मध्य में अवस्थित है. यह कोसी प्रमंडल का मुख्यालय व महत्वपूर्ण स्थान है. यहां से हजारों की संख्या में रोगी इलाज के लिए दिल्ली,
चंडीगढ़, कोलकाता व मुंबई जाते हैं. गरीबी के कारण ऐसे रोगियों को भारी परेशानी होती है. श्री यादव ने बताया है कि पटना में एम्स के अलावे उत्तर बिहार में भी एक एम्स खोलने की योजना सरकार के पास विचाराधीन है.
सहरसा मुख्यालय के बगल में बैजनाथपुर पेपर मिल बंद हो जाने से उसकी 45 एकड़ सरकारी जमीन का कोई उपयोग नहीं हो रहा है. उन्होंने बताया है कि परिसर के बगल में रैयती जमीन भी उपलब्ध है. विधायक के इस पत्र से यह तो स्पष्ट है कि एम्स के बहाने बैजनाथपुर पेपर मिल को दफन करने की राजनीतिक तैयारी हो रही है. ऐसे में रोजगार सृजन के लिए पेपरमिल के शुरू होने की उम्मीद करना बेकार है.
1975 में हुई थी स्थापना: जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर बैजनाथपुर में पेपर मिल की स्थापना 1975 में हुई थी. 48 एकड़ भूमि अधिग्रहण करके बिहार सरकार ने इसे चलाने के लिए निजी और सरकारी सहयोग के उद्देश्य से बिहार पेपर मिल्स लिमिटेड कंपनी का गठन किया. जिसने निर्माण कार्य शुरू करवाया. 1978 में निजी उद्यमियों से करार खत्म होने के कारण काम रूक गया. तत्कालीन सरकार ने पब्लिक क्षेत्र के अंतर्गत परियोजना को चलाने का निर्णय लिया. जिसके बाद बैजनाथपुर पेपर मिल बिहार राज्य औद्योगिक विकास निगम की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी हो गयी.
उस दिन से कंपनी के शत प्रतिशत शेयर की हकदार भी निगम हो गयी. बिहार सरकार और निगम की आपसी सहमति के बाद विदेश से एक पुरानी मशीन भी खरीदी गयी. भारत सरकार के प्रतिष्ठान हिंदुस्तान स्टील कंस्ट्रक्शन लिमिटेड को मिल में होने वाले असैनिक कार्यों की जिम्मेवारी दी गयी. 1987 में निगम द्वारा कार्य स्थल में दो वर्षों का लक्ष्य निर्धारित कर कार्य शुरू किया गया.
लेकिन निगम और सरकार द्वारा सही समय पर राशि का आवंटन नहीं होने के कारण निर्माण कार्य की गति धीमी होती गयी. अंतत: सरकारी उदासीनता और बैंकों के असहयोग के कारण परियोजना कार्य बंद होती चली गई. 1996-97 में बैंक ऑफ इंडिया द्वारा स्वीकृत कर्ज 7 करोड 40 लाख विमुक्त करने के बाद मिल का कार्य फिर से शुरू किया गया. इतनी राशि से मिल का 80 प्रतिशत कार्य ही पूर्ण हो पाया.
अब भी चालू हालत में हैं पुरानी मशीनें
पेपर टेक्नोलाजी के जानकार बताते हैं कि मिल में लगी सभी मशीनें अभी चालू हालत में है. अगर आज काम शुरू करना चाहे तो ये मशीनें चलने लगेगी. उन्होंने बताया कि पूर्व में मिल की क्षमता 15 टन प्रतिदिन थी. लेकिन उसके बजाय मिल की क्षमता वर्तमान में 30 से 40 टन प्रतिदिन है. मशीनें पुरानी हैं लेकिन अगर इसका सिर्फ मेंटेनेंस कर दिया जाए तो फिर इसके कार्य करने में कोई परेशानी नहीं होगी.
