तीन दिनों तक मस्ती व रंग भरे माहौल में डूबे रहते है लोग
सहरसा नगर : ढोल, मृदंग की धुन पर उमंग से सराबोर शाम होते ही बनगांव के विभिन्न टोले में युवाओं की टोली होली गीत गाकर माहौल को भक्ति के रंग में रंग रहे हैं. हालांकि गांव में प्रवेश करने के साथ ही आपका वास्ता गगनचुंबी इमारतों से पड़ेगा, लेकिन होली गीत के बार-बार दोहराये जाने वाले शब्द लक्ष्मीपति हो तो समझिए कि आप निश्चित रूप से सहरसा जिला मुख्यालय से आठ किमी पश्चिम बनगांव पहुंच गये हैं.
जहां की आबादी वैज्ञानिक युग के अनुसार विकास के पथ पर प्रगति कर रहीं है तो मिथिलांचल की सभ्यता व संस्कृति आज भी रहने वाले सभी लोगों के सीने में कुलांचे भर रही हैं. ब्रज की होली की तरह पारंपरिक रूप से मनायी जाने वाली बनगांव की होली की परंपरा कायम रखे हुए हैं.
जय बाबाजी के नाम पर ही आस्था : गांव के पश्चिमी छोड़ पर लोक देवता संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं की कुटी व आकर्षक रूप धारण किये गोसाईं बाबा का ठाकुरबाड़ी भी ग्रामीणों की बाबा के प्रति आस्था की कहानी सुना रहा है. गांव के बड़े बुजुर्ग हो या बच्चे अपने काम की शुरुआत संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं के स्मरण से ही करते हैं. लोक आस्था के प्रतीक बन चुके देवता को बाबाजी के नाम से भी संबोधित किया जाता है.
अद्भुत व मनोरम होता है दृश्य : बनगांव में मनाई जाने वाली होली सूबे में ब्रज की होली की तरह ही अपनी पहचान बना चुकी है. ग्रामीण बताते है कि द्वापर युग से ही बनगांव में होली की परंपरा रही है. वर्तमान में खेले जाने वाले होली का स्वरूप संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं के द्वारा तय किया गया था. जिसमें गांव के पांच बंगला (दरवाजा) को चिन्हित किया गया था. इसमें गांव के रामपुर बंगला, संनोखरी बंगला, डिहली बंगला, मंजुरी खां बंगला व विषहरी स्थान बंगला शामिल है.
गांव घुमने के क्रम में ग्रामीण प्रो अरुण कुमार खां से मुलाकात होती है, जो बताते है कि इन बंगलों पर संबंधित टोला (मोहल्ला) के लोग जमा होकर ऊंची श्रृंखला बनाते है. इस दौरान संत लक्ष्मीपति रचित भजनों को गाते रहते हैं. होली के दिन गांव के पांचों बंगलों पर होली खेलने के बाद सभी ग्रामीण जैर (रैला) की शक्ल में भगवती स्थान पहुंच गांव की सबसे उंची मानव श्रृंखला बनाते हैं. ग्रामीण बताते हैं होली देखने आने वाले दर्शकों की भीड़ हजारों में होती है.
