प्रासंगिकता सबने कहा, गांधी के जीवन, उनके विचारों से ले सकते हैं जीवन की सीख
सहरसा : गांधी की प्रासंगिकता समाज के हर पहलू को छूती है. जातीय व्यवस्था में कर्म की प्रधानता शैक्षणिक व्यवस्था में डिग्रियों से अधिक ज्ञान अर्जन की महत्ता किसी राष्ट्र के लिए विशेषकर भारतीय पृष्ठभूमि में अर्थ उपार्जन का स्रोत भारत जैसे देश के गांव से जोड़ना गांधी के मूल सिद्धांतों की बानगी भर है. यूनेस्को ने हाल के दिनों में विद्यार्थियों के अध्ययन काल में उनके मानसिक दबाव से उन्हें निजात दिलाने के लिए वैज्ञानिक उपायों और पढ़ाई के ढंग में बदलाव के लिए विमर्श किया है.
अध्ययन के इन विकारों पर महात्मा गांधी ने अपने विचारों में पहले ही कहा कि मानवता से बड़ी किताब नहीं है. सिर्फ किताबों में लिखी बात ज्ञान का आधार नहीं हो सकती. जीवनभर ज्ञान प्राप्ति के हिमायती रहे बापू ने दबाव मुक्त शिक्षा जो शिक्षा के मंदिर किताब वैचारिक आदान-प्रदान जीवन में उसकी प्रासंगिकता पर निर्भर करती है. उसके ही पक्षधर रहे. यद्यपि आलोचकों ने प्राथमिक शिक्षा के लिए बापू के विचारों को उपयोगी माना. बापू कहते हैं कि सरस जीवन उन्नत और उन्नतशील उद्योगों के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है. ना की जबरन थोपे गये आदेशों के अनुकूल व प्रकृति के नियमों की अवहेलना करके.
बापू के जन्मदिवस पर विभिन्न लोगों ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि बापू के विचार वर्तमान में भी प्रासंगिक हैं. डॉक्टर सुषमा ओझा कहती हैं कि स्वच्छता का मूलभाव जीवन में गांधी के उदाहरणों के संग शुरू होता है. पुस्तकों में शामिल उनके जीवन वृत्त हमें प्रेरणा मात्र से सत्य का परिचय कराते हैं. डॉक्टर बृजेश कुमार कहते हैं कि आज के युवाओं को भी साबरमती के संत को समझना पड़ेगा. वह आदर्श पुरुष थे. नाथूराम गोडसे को महिमामंडित किये जाने का वर्तमान में चल रहे प्रयास पर डॉक्टर विजय शंकर ने आड़े हाथ लेते हुए कहा कि देश विवादों के संक्रमण काल से गुजर रहा है. वे राष्ट्रपिता थे. जिन्होंने हमें आजादी दी.
हमें उन्हें उसी नजर से देखना चाहिए. उनकी तुलना किसी और तरीके से करना यह राष्ट्र की तौहीन होगी. रैंकर्स एकेडमी के निदेशक डॉ राजीव रंजन सिंह, मिलेनियम के बीके झा व जीवन दीप स्कूल के पंकज सिंह बताते हैं कि बुनियादी शिक्षा का मूल मंत्र गांधी की देन है. गांधी ने कौशल विकास पर जोर देते हुए मानवीय श्रम को प्रश्रय देने की बात कही थी.
डॉक्टर रंजेश कुमार सिंह कहते हैं कि खादी पहने हुए उस फकीर में ऐसी ताकत थी. जिसने देश और विदेश में अहिंसा का लोहा मनवा दिया. फिरंगियों को भागने पर मजबूर कर हमें आजादी दी. अब क्यों नहीं गांधी पैदा होते हैं. जो देश को नयी बुलंदियों पर ले जायें. डॉ यू सी मिश्रा कहते हैं कि गांधी जी का पूरा जीवन ही अनुकरणीय है.
