पूर्णिया में पर्यटन विकास के मुद्दे को लेकर नेताजी का पसीना उतार रहे मतदाता

पूर्णिया

पूर्णिया. पिछले कई दशकों से पूर्णिया को पर्यटन विकास की छटपटाहट रही है पर विडम्बना है कि न तो कभी किसी राजनीतिक दल ने पर्यटन को मुद्दा बनाने की पहल की और न ही किसी जनप्रतिनिधि की ओर से इस दिशा में कारगर कदम उठाए गए. यही वजह है कि इस मुद्दे को लेकर पूर्णिया के मतदाता नेताजी का पसीना उतारने के मूड में हैं. वे उन पर सवालों की बौछार करते हुए पूछ रहे हैं कि पूर्णिया के पर्यटन विकास के लिए उन्होंने क्या किया और फिर उन्हें ही हम वोट क्यों दें. पूर्णिया के लोग मानते हैं कि बदलते दौर में यहां विकास की नई नई इबारत लिखी गई. कई मामलों में पूर्णिया देश के मानचित्र पर भी उभरा पर पर्यटन के क्षेत्र में वह काम आज तलक नहीं हो सका. लोग कहते हैं कि जलालगढ किला और पूरण देवी मंदिर को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित करने की घोषणा जरूर हुई पर वैसा कुछ नहीं हो सका जो पर्यटन विकास के लिए अहम है. दरअसल, ऐतिहासिक धरोहरों को संजोए पूर्णिया पर्यटन के क्षेत्र में आज भी विकास की बाट जोह रहा है. हालांकि हालिया सालों में कुछ काम जरुर हुए हैं और काझा कोठी की प्राकृतिक खूबसूरती को संवारने की पहल से पर्यटन विकास की उम्मीद जगी पर यह सवाल अभीभी सामने है कि इस उम्मीद को मुकाम कब मिलेगा? पूर्णियावासी पिछले कई दशकों से पर्यटन क्षेत्र के विकास को लेकर वायदों और घोषणाओं को लेकर इस तरह के सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि मुगलिया सल्तनत की बानगी बयां करने वाला जिले का जलालगढ़ किला आज भी खंडहर की शक्ल में दिख रहा है. वैसे, देखा जाये तो पर्यटन विकास के नाम पर कतिपय धार्मिक स्थलों के सौंदर्यीकरण के अलावा बहुत कुछ नहीं हो सका है, जिसकी उम्मीद आज तक लोग बांधे हुए हैं.

जलालगढ़ किले के उद्धार का इंतजार

इंडो-नेपाल बॉर्डर से सटे ऐतिहासिक जलालगढ़ किला को इस्लामिक स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना कहा जाता है. यह जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर एनएच 57 के किनारे स्थित है. इस वर्गाकार किले की लंबाई और चौड़ाई एक सौ गुणा एक सौ वर्ग मीटर है. प्रथम गजेटियर में केपीएस मेनन ने 1911 में लिखा है कि ऐतिहासिक किले का निर्माण खगड़ा किशनगंज के प्रथम राजा सैयद मो जलालुद्दीन खां द्वारा हुआ था. सैयद जलालुद्दीन खां को राजा का खिताब मुगल बादशाह जहांगीर द्वारा किया गया था. जानकारों के अनुसार, 16 वीं शताब्दी में इस ऐतिहासिक किले का निर्माण मोरंग नेपाल क्षेत्र के लुटेरों से सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया गया था. इसे पर्यटक स्थल बनाने की घोषणा की गई थी पर स्थिति जस की तस है.

पुराने मंदिरों को नहीं बनाया जा सका पर्यटन स्थल

पूर्णिया सिटी में पुरणदेवी मंदिरजिसे वन देवी भी कहा जाता रहा है. पटना की पटनदेवी की तरह यहां भी देवी जागृत मानी जाती हैं. शहर को दो हिस्सों में बांटने वाली सौरा नदी के तट पर अवस्थित काली मंदिर का अपना अलग इतिहास रहा है. सात सौ वर्ष पुराना जैन मंदिर जैनियों का समागम स्थल है, तो ऐतिहासिक गुरुद्वारा साझी आस्था की मिसाल भी है. अव्वल तो यह कि मंदिरों के इस शहर में भक्तों को दर्शन देने के लिए भगवान जगन्नाथ मंदिरों से निकल कर नगर भ्रमण करते हैं. माता त्रिपुर सुंदरी का विशाल मंदिर आज भी सिटी की ऐतिहासिक और धार्मिक अहमियत का अहसास दिला रहा है. अपने इलाके के इन धरोहरों को संवार-संभाल कर रखने में हम बहुत कामयाब नहीं हो सके हैं. पर हम निराशावादी भी नहीं. पूर्णिया सिटी को भरोसा है कि पर्यटन स्थल बनने की उम्मीद को मुकाम मिलेगा.

नहीं संवर सका साहित्य व खेल क्षेत्र का इतिहास

यह विडम्बना रही है कि पूर्णिया में साहित्य, संस्कृति और खेल के इतिहास को भी सहेजने की कोशिश नहीं हो सकी. यहां उल्लेख्य है कि साहित्य, खेल और फिल्म के मामले में भी पूर्णिया अग्रणी रहा है. बंगला साहित्य के प्रेमचन्द सतीनाथ भादुड़ी, आंचलिक उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु, अनुप लाल मंडल, जनार्दन प्रसाद झा द्विज, लक्ष्मी नारायण सुधांशु सरीखे विद्वानों ने पूर्णिया की जमीं को समृद्ध किया है. इसी तरह खेल के क्षेत्र में अब्दुल समद, मो.लतीफ, अमल मजुमदार आदि ने राष्ट्रीय फलक पर पूर्णिया की पहचान बनाई .;चर्चित फिल्म तीसरी कसम और टीवी सीरियल मैला आंचल की शुटिंग पूर्णिया में ही हुई थी . सोनपुर के बाद बिहार का सबसे बड़ा मेला पूर्णिया के ही गुलाबबाग में लगता था . इन उपलब्धियों के अलावा पूर्णिया की खासियत यहां का खुशगवार मौसम और प्रकृति का अल्हड़पन है जो पर्यटकीय विकास में अहम माना जाता रहा है.

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पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल

सौरा तट पर मैरिन ड्राइवजलालगढ़ का किलापूरण देवी मंदिरकाली मंदिर, सिटीकला भवनकैथोलिक चर्च, गिरिजा चौकशहीद स्मारक, टाउन हालपाल्मर्स हाउस, पूर्णिया कॉलेजफोर्ब्स हाउस, कन्या उच्च विद्यालयगांधी सर्किट, रानीपतरा

रानीसती मंदिर, कसबा

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