पूर्णिया : कोसी-सीमांचल से लेकर बंगाल और नेपाल तक बाबा वरुणेश्वर के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है. संकट के समय मन्नत मांगने से लेकर मनोकामना पूरी होने के बाद दर्शन के लिए पहुंचने तक यहां भक्तों का आना-जाना सालभर लगा रहता है. पूर्णिया जिले के बड़हरा कोठी प्रखंड स्थित बाबा वरुणेश्वर स्थान की महिमा श्रद्धालुओं के बीच अपरंपार मानी जाती है. मान्यता है कि जो भक्त अनायास यहां पहुंच जाते हैं, उन पर बाबा की विशेष कृपा होती है.
मंदिर परिसर में बाबा वरुणेश्वर के अलावा मां काली, शिवगंगा, भैरव, बजरंगबली, नंदी और राम-लखन-सिया के मंदिर भी हैं. मंदिर परिसर की देखरेख बाबा वरुणेश्वर स्थान विकास समिति की ओर से की जाती है.
शिवरात्रि पर एक माह तक लगता है मेला
महाशिवरात्रि के अवसर पर बाबा वरुणेश्वर स्थान में विशेष आयोजन होता है. श्रद्धालु बटेश्वर स्थान से जल लेकर बाबा वरुणेश्वर का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं. शिवरात्रि के पहले दिन से ही यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगती है और करीब एक माह तक मेले का माहौल बना रहता है.
मेले में दूर-दराज से व्यापारी पहुंचते हैं. लकड़ी, लोहे और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी विभिन्न वस्तुओं की दुकानें सजती हैं. पूजा-अर्चना के साथ मेले में खरीदारी और ग्रामीण बाजार का भी अलग आकर्षण देखने को मिलता है.
गाय के दूध से सामने आया शिवलिंग का रहस्य
बाबा वरुणेश्वर स्थान के शिवलिंग को श्रद्धालु स्वयंभू महादेव मानते हैं. इसके प्रकट होने को लेकर स्थानीय लोगों के बीच एक प्रचलित किंवदंती है.
कहा जाता है कि बहुत पहले यहां चारों ओर घना जंगल हुआ करता था. चरवाहे जंगल में अपनी गायें चराने ले जाते थे. गायों के झुंड में एक गाय रोज एक निश्चित स्थान पर जाकर अपने आप दूध गिरा देती थी. चरवाहों को जब इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने गाय पर नजर रखनी शुरू की.
एक दिन चरवाहों ने गाय को उसी स्थान पर दूध गिराते देखा. जब उस जगह की जांच की गयी तो वहां शिवलिंग मिला. इसके बाद ग्रामीणों ने वहां झोपड़ी बनाकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी. समय के साथ यहां मंदिर का निर्माण कराया गया और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए धर्मशाला भी बनायी गयी.
अज्ञातवास में पांडवों के आने की भी मान्यता
बाबा वरुणेश्वर स्थान को लेकर एक और मान्यता स्थानीय बुजुर्गों के बीच प्रचलित है. उनके अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां पहुंचे थे और उन्होंने बाबा वरुणेश्वर की पूजा-अर्चना की थी. स्थानीय मान्यता में श्रृंगी ऋषि के भाई के यहां आकर साधना करने की कथा भी जुड़ी हुई है.
दो नदियों के बीच स्थित यह धार्मिक स्थल प्राकृतिक दृष्टि से भी खास माना जाता है. यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर की आस्था के साथ आसपास का वातावरण भी आकर्षण का केंद्र रहता है.
