मतदान के बाद एनडीए व महागठबंधन के समर्थक कर रहे हैं अपनी-अपनी जीत के दावे

विधानसभा चुनाव

पूर्णिया. मंगलवार को पूर्णिया जिले की सात विधानसभा सीटों का चुनाव संपन्न होने के साथ ही प्रत्याशियों की किस्मत भी ईवीएम में कैद हो गई. हालांकि प्रत्याशियों की किस्मत का पिटारा 14 नवंबर को खुलेगा पर अबतक के रुझानों और अलग-अलग खेमों से क्षण-क्षणकर आ रही सूचनाओं का निहितार्थ यह है कि पूर्णिया की सात में से दो पर तिकोना और पांच पर अन्ततः एनडीए और महागठबंधन के बीच आमने-सामने की लड़ाई हो गयी. यही वजह है कि जीत के दावे दोनों गठबंधन कर रहे हैं. दोनों के अलग-अलग दावे हैं तो तर्क भी. यह पहचानना थोड़ा अभी कठिन है कि किसके दावे 14 नवंबर तक दिल को झूठी तसल्ली दिलाते हैं और किसके दावे जीत की मंजिल तक पहुंचाते हैं. वैसे जीत के प्रति आशान्वित महागठबंधन का दावा है कि अल्पसंख्यकों व यादवों के एकतरफा वोटों ने उनकी जीत के टेढ़े-मेढ़े रास्ते को और आसान कर दिया है जबकि एनडीए गठबंधन का मानना है कि पीएम मोदी और सीएम नीतीश कुमार की वजह से गैर अल्पसंख्यक मतों के ध्रुवीकरण और एकमुश्त महिला वोटरों से मिली बढ़त एनडीए को मंजिल तक पहुंचा सकती है. इस लड़ाई में दोनों गठबंधन के कार्यकर्ताओं में ज्यादा जोश और उत्साह दिख रहा है. 2020 के विधानसभा चुनाव में पूर्णिया की सात में से एक सीट कांग्रेस के खाते में गयी थी जबकि राजद का खाता भी नहीं खुला था. महागठबंधन का दावा है कि इसबार उसके सीटों में इजाफा होगा. वहीं एनडीए का दावा है कि महागठबंधन के ‘शोर’ के बीच एनडीए अपनी जीत के प्रति न केवल पूरी तरह आशान्वित है बल्कि सीटें भी बढ़ सकती हैं. ओवैसी की पार्टी भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने प्रति पूरी तरह आशान्वित है. वैसे यहां लोगों का मिजाज भी अन्य जगहों से कुछ अलग है. यहां जो करना होता है कर गुजरते हैं. सामने बोलते नहीं. इसलिए अक्सर चुनाव नतीजे यहां अप्रत्याशित होते रहे हैं. पिछले कई चुनावों में भी चुनावी नतीजे को लेकर इसी तरह का संशय चल रहा था. चुनावी पंडितों ने चुनावी नतीजे से पहले ही विजयश्री की माला पहना दी थी. मिठाइयां भी बंट गईं पर जब नतीजा अप्रत्याशित सामने आया तो लोग भौंचक रह गये. चुनाव में सबसे ज्यादा उत्साह महिला और युवा वर्गों में ही था. बुधवार को दिनभर एनडीए और महागठबंधन खेमें में जीत-हार को लेकर गुना-भाग का दौर जारी रहा. कौन कहां से लीड कर रहा है तो कहां कितने से पिछड़ रहा है. किसने साथ दिया और कौन अंतिम क्षणों में दगा दे गया सभी का आकलन किया जा रहा था. अलग-अलग विधानसभा से पार्टी समर्थकों के आने-जाने का सिलसिला जारी था. आकलन भले ही अलग-अलग हों पर सभी के रास्ते जीत की ओर जा रहे थे.

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