पूर्णिया शहर के विवेकानंद कॉलोनी में शान से खड़ा 100 साल से भी अधिक पुराना एक बरगद का पेड़ महज एक वृक्ष नहीं, बल्कि देश की आजादी की लड़ाई का मूक गवाह है. कभी घने जंगलों के बीच छिपे इस पेड़ के नीचे स्वतंत्रता सेनानी रात के अंधेरे में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की रणनीति बनाते थे. आजाद भारत में पूर्णिया के प्रथम विधायक व स्वतंत्रता सेनानी कमलदेव बाबू भी इसी ऐतिहासिक स्थल से गिरफ्तार हुए थे. आज यह बूढ़ा बरगद न सिर्फ लोगों को छांव दे रहा है, बल्कि स्थानीय लोग और इतिहास प्रेमी इस धरोहर को 'राजकीय विरासत' का दर्जा देने की पुरजोर मांग भी कर रहे हैं.
जब गोकुल कृष्ण आश्रम पर पड़ी अंग्रेजों की नजर, तब बरगद बना नया ठिकाना
स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में पूर्णिया जिले का अहम योगदान रहा है. अंग्रेजी हुकूमत के दौरान कांग्रेस का 'गोकुल कृष्ण आश्रम' क्रांतिकारियों का मुख्य केंद्र हुआ करता था, जहां से पूरे आंदोलन की कार्ययोजनाओं को अमलीजामा पहनाया जाता था.
पूर्णिया के प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ. अजय सिन्हा अपने पिता (कमलदेव बाबू) के संस्मरणों का हवाला देते हुए बताते हैं कि जब आश्रम अंग्रेज अफसरों की नजर में आ गया और वहां कड़ी निगरानी शुरू हो गई, तब क्रांतिकारियों को एक सुरक्षित विकल्प की तलाश करनी पड़ी. ऐसे में इस विशाल बरगद की छांव ने आजादी के दीवानों को सुरक्षित पनाह दी, जिसके बगल में ही उस समय उनका फूस का घर हुआ करता था.
ढिबरी की रोशनी में रची जाती थी क्रांति की रूपरेखा
आज जहां विवेकानंद कॉलोनी, लाइन बाजार और माधोपाड़ा जैसे घने रिहायशी मोहल्ले हैं, वहां उस दौर में सिर्फ जंगल ही जंगल हुआ करता था. जंगलों के बीच स्थित इस विशाल बरगद के नीचे अंग्रेजों की नजरों से बचने की पूरी गुंजाइश थी.
उस समय बाजार में दुकानदारी करने वाले कई लोग भी गुपचुप तरीके से इस आंदोलन से जुड़े थे. दुकानदारों के जरिए गुप्त रूप से सूचनाएं भिजवाई जाती थीं. इसके बाद रात के समय छुपते-छुपाते क्रांतिकारी यहां इकट्ठा होते थे. चूंकि उस समय लालटेन मिलना भी मुश्किल था, इसलिए टिन से बने डब्बे वाली 'ढिबरी' की मद्धिम रोशनी में अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने की कार्ययोजनाएं तैयार की जाती थीं.
प्रथम विधायक कमलदेव बाबू की इसी जगह से हुई थी गिरफ्तारी
स्वतंत्रता सेनानी और आजाद भारत में पूर्णिया के प्रथम विधायक रहे कमलदेव बाबू के संस्मरण की प्रकाशित पुस्तक में इस ऐतिहासिक बरगद के नीचे रची गई कई साहसिक योजनाओं का जिक्र मिलता है. इतिहास के पन्नों में यह भी दर्ज है कि कमलदेव बाबू की गिरफ्तारी भी अंग्रेजों द्वारा इसी जगह से की गई थी.
धरोहर को राजकीय विरासत घोषित करने की उठ रही मांग
आज 100 से अधिक वर्षों का सफर तय कर चुका यह बूढ़ा बरगद वर्तमान पीढ़ी को भी अपनी ठंडी छांव दे रहा है. नई पीढ़ी भले ही इसके गौरवशाली इतिहास से पूरी तरह वाकिफ न हो, लेकिन बुजुर्ग आज भी इसके किस्से सुनाकर गौरवान्वित महसूस करते हैं.
लंबे समय से पूर्णिया के बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों द्वारा इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करने और इसे 'राजकीय विरासत' (State Heritage) की सूची में शामिल करने की मांग की जा रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी आजादी के इन गुमनाम नायकों और उनके इस ठिकाने से प्रेरणा ले सकें.
