बनमनखी : पूर्णिया जिले के बनमनखी प्रखंड अंतर्गत मोहनियां चकला पंचायत के वार्ड संख्या 11 में स्थित धार्मिक परिसर आस्था, ज्ञान और सामाजिक समरसता का अनूठा केंद्र बना हुआ है. यहां एक ही परिसर में राम-जानकी मंदिर, महादेव मंदिर, सत्संग भवन और सार्वजनिक पुस्तकालय स्थित है. गांव के लोग इसे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखते हैं.
जंगलों के बीच दान की जमीन पर हुई मंदिर की शुरुआत
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 1954 से पहले यह इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था और आबादी भी काफी कम थी. उस समय के जमींदार स्व. अकरु दास ने धार्मिक भावना से प्रेरित होकर राम-जानकी मंदिर के नाम पर एक एकड़ 25 डिसमिल जमीन दान की थी. इसके बाद यहां राम-जानकी मंदिर का निर्माण कराया गया और नियमित पूजा-पाठ के लिए पुजारी की व्यवस्था की गई.
मंदिर की देखरेख के लिए मुसहरू साह, जागेश्वर साह, लक्ष्मण भगत, हिया साह और लतरु साह को सेवायत बनाया गया था. समय के साथ ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया और राम-जानकी की प्रतिमाएं स्थापित की गईं.
1994 में हुई महादेव मंदिर की स्थापना
गांव के सेवानिवृत्त शिक्षक स्व. मनियार साह की पहल पर ग्रामीणों ने महादेव मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया. छह जून 1994 को मंदिर की स्थापना की गई. महाशिवरात्रि के अवसर पर विधिवत शिवलिंग की स्थापना के साथ विशेष धार्मिक आयोजन हुआ था.
तब से यहां नियमित पूजा-अर्चना होती है. महाशिवरात्रि पर मंदिर को विशेष रूप से सजाया जाता है, कई दिनों तक मेला लगता है और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. सावन माह में श्रद्धालु मनिहारी से गंगाजल लेकर पहुंचते हैं और महादेव का जलाभिषेक करते हैं.
रोज सुबह-शाम गूंजता है सत्संग
स्व. जोगिंद्र साह, जो सेवानिवृत्त शिक्षक थे, ने सत्संग भवन के निर्माण की पहल की. उनके नेतृत्व में वर्ष 2003 में भवन का निर्माण कराया गया. यहां आज भी प्रतिदिन सुबह और शाम सत्संग का आयोजन होता है. गांव की महिलाएं और अन्य सत्संग प्रेमी नियमित रूप से यहां पहुंचकर धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं.
पुस्तकालय में ज्ञान की भी विरासत
धार्मिक परिसर में एक सार्वजनिक पुस्तकालय भी स्थापित किया गया. यहां आध्यात्मिक पुस्तकों के साथ उपन्यास, नाटक और समाचार पत्रों का संग्रह रहा है. गांव के बुजुर्ग, युवा और विद्यार्थी यहां बैठकर अध्ययन किया करते थे. हालांकि बदलते समय और व्यस्तता के कारण पुस्तकालय की गतिविधियां पहले की तुलना में कम हो गई हैं, लेकिन यह आज भी गांव की ज्ञान और संस्कार की विरासत का प्रतीक बना हुआ है.
मोहनियां चकला का यह परिसर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, आध्यात्मिक चेतना और ज्ञान का भी केंद्र है. एक ही परिसर में महादेव और राम-जानकी के मंदिर, सत्संग भवन तथा पुस्तकालय की मौजूदगी इस गांव को एक अलग पहचान देती है.
