पूर्णिया के महामाया मंदिर में शिव व राधा-कृष्ण की पूजा: एक ही प्रांगण में 'हर' और 'हरि', जानें 50 साल पुराना इतिहास

पूर्णिया का महामाया मंदिर भगवान शिव और कृष्ण के एक साथ दर्शन का दुर्लभ अवसर प्रदान करता है. 50 वर्ष से अधिक पुराने इस मंदिर में भक्तों को आध्यात्मिक शांति मिलती है. जन्माष्टमी और सावन में यहाँ का माहौल देवघर जैसा हो जाता है.

पूर्णिया शहर के व्यस्ततम व्यावसायिक क्षेत्र लाइन बाजार स्थित महामाया मंदिर श्रद्धालुओं के लिए अगाध श्रद्धा और आध्यात्मिक शांति का बड़ा केंद्र बना हुआ है. इस पावन धाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां देवाधिदेव महादेव यानी 'हर' और भगवान श्रीकृष्ण यानी 'हरि' एक ही प्रांगण में साक्षात विराजमान हैं.

दैनिक दर्शनार्थियों के अलावा गुरुवार को यहां राधा-कृष्ण युगल सरकार के दर्शन और विशेष पूजन के लिए दूर-दराज से भक्तों का तांता लगा रहता है.

जहां 'हर' और 'हरि' का एक साथ होता है पावन दर्शन

सनातन परंपरा में भगवान शिव और भगवान श्रीकृष्ण के पारस्परिक संबंध को अत्यंत गूढ़ और अनन्य माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महादेव भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त हैं और श्रीकृष्ण भी भगवान आशुतोष की नित्य आराधना करते हैं.

यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म में 'हर' और 'हरि' को एक ही परमब्रह्म के दो पूरक स्वरूप माना जाता है. पूर्णिया का महामाया मंदिर इसी अद्वैत विचार को धरातल पर साकार करता है, जहां भक्त एक ही फेरे में दोनों ईश्वरीय शक्तियों की वंदना कर पुण्य के भागी बनते हैं.

पांच दशक पुराना है महामाया मंदिर का गौरवशाली इतिहास

लाइन बाजार के गंगा-दार्जिलिंग रोड किनारे स्थित इस मंदिर का इतिहास लगभग 50 वर्ष पुराना है. स्थानीय लोग इस मोहल्ले को ‘नया टोला’ के नाम से भी जानते हैं.

घनी आबादी और शहर के प्रमुख दवा मार्केट के बीच स्थित होने के बावजूद मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही एक असीम शांति का अहसास होता है. आम दिनों में नियमित पूजन के अलावा गुरुवार के दिन विशेष महाआरती और भोग का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं.

एक ही प्रांगण में स्थापित हैं कई प्रमुख देवी-देवता

महामाया मंदिर केवल शिव और राधा-कृष्ण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां सनातन धर्म के कई प्रमुख विग्रह प्राण-प्रतिष्ठित हैं.

परिसर में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं के छोटे-बड़े देवालय बने हुए हैं. मंदिर के पुजारी द्वारा सभी विग्रहों की दैनिक वैदिक विधि से पूजा-अर्चना और भोगराग संपन्न कराया जाता है, जिससे श्रद्धालु अपनी-अपनी कुल परंपरा और आस्था के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं.

जन्माष्टमी और सावन में दिखता है देवघर जैसा भक्तिमय नजारा

वर्षभर निरंतर पूजा-पाठ चलने के बावजूद सावन, महाशिवरात्रि और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर इस मंदिर का स्वरूप पूरी तरह दिव्य और अलौकिक हो जाता है.

सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक के लिए उमड़ने वाली भीड़ से यहां देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम जैसा माहौल नजर आता है. वहीं भाद्रपद में जन्माष्टमी के मौके पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है. इन बड़े पर्वों पर मंदिर प्रबंधन समिति की ओर से कतारबद्ध दर्शन, सुरक्षा और सांध्यकालीन भजन-कीर्तन की विशेष व्यवस्था की जाती है.

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लेखक के बारे में

By अरुण कुमार

अरुण कुमार प्रिंट माध्यम में 32 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत दैनिक हिन्दुस्तान से की. अभी प्रभात खबर के पूर्णिया कार्यालय में कार्यरत हैं. सामाजिक सरोकार, अपराध, शिक्षा, राजनीतिक खबरों में रुचि रखते हैं.

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