ऐतिहासिक नगरी पूर्णिया सिटी (जो कभी राजा-रजवाड़ों के समय मुख्य शहर हुआ करता था), जिला मुख्यालय से महज सात किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसा अनूठा मंदिर समेटे हुए है जो अपनी खास वास्तुकला के लिए विख्यात है. 'श्री जैन श्वेतांबर पार्श्वनाथ मंदिर' के नाम से प्रसिद्ध 700 साल से भी अधिक पुराना यह दर्शनीय स्थल सीमांचल और उत्तर बिहार में जैन धर्म व सनातन आस्था का एक प्रमुख संगम है. घनी आबादी के बीच स्थित इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी दीवारों पर की गई शीशे की अद्भुत नक्काशी है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां खिंचे चले आते हैं.
राजस्थानी शैली में शीशे की नक्काशी से सजा है कोना-कोना
यह प्राचीन मंदिर अपनी वास्तुकला के मामले में आसपास के अन्य सभी मंदिरों से बिल्कुल अलग है:
- कांच की बारीक कारीगरी: मंदिर के अंदर और बाहर की दीवारों पर राजस्थानी शैली में शीशे के छोटे और बारीक टुकड़ों से बेहद खूबसूरत नक्काशी की गई है.
- मंत्रमुग्ध करती है चमक: जब रोशनी इन शीशों पर पड़ती है, तो पूरी नक्काशी जीवंत हो उठती है, जो यहां आने वाले हर दर्शनार्थी को मंत्रमुग्ध कर देती है.
700 वर्षों का इतिहास और स्वयंभू प्रतिमा
इस मंदिर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व इसे उत्तर बिहार का एक प्रमुख तीर्थ स्थल बनाता है:
- अति प्राचीन स्थल: मान्यताओं के अनुसार, यह जैन श्वेतांबर मंदिर लगभग 700 साल से भी ज्यादा पुराना है.
- विराजमान हैं कई देव: इस मंदिर में जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के साथ ही भगवान भैरवनाथ की स्वयंभू (स्वयं प्रकट हुई) प्रतिमा भी स्थापित है, जिनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है.
फरवरी माह में सजता है आस्था का भव्य संसार
यूं तो मंदिर में सालों भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन प्रतिवर्ष फरवरी माह में आयोजित होने वाला वार्षिकोत्सव बेहद खास होता है:
- विशेष अनुष्ठान: वार्षिकोत्सव के दौरान माता पद्मावती का विशेष पूजन और घंटाकर्ण महावीर का हवन पूरे विधि-विधान से संपन्न कराया जाता है.
- बाबा भैरवनाथ को छप्पन भोग: इस अवसर पर बाबा भैरवनाथ को 'छप्पन भोग' अर्पित किया जाता है, जो इस आयोजन का मुख्य आकर्षण होता है.
- देश-विदेश से आते हैं श्रद्धालु: इस पावन वार्षिकोत्सव में शामिल होने और अद्भुत मंदिर के दर्शन के लिए कोलकाता, शेष बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल से भारी संख्या में श्रद्धालु पूर्णिया पहुंचते हैं.
