विष्णुपुर काली मंदिर का अनोखा इतिहास: 300 साल पहले दुल्हन का 'खोइंछा' न खुलने पर प्रकट हुईं मां

Bishnupur Kali Temple History: पूर्णिया जिले के अमौर प्रखंड में स्थित विष्णुपुर काली मंदिर की महिमा अद्भुत है. मान्यता है कि ३०० साल पहले मां काली एक नवविवाहित दुल्हन के आंचल (खोइंछा) में बंधकर इस गांव में आई थीं. लाख कोशिशों के बाद भी जब आंचल की गांठ नहीं खुली, तब मां ने स्वप्न देकर इसी स्थान पर रहने की इच्छा जताई थी.

पूर्णिया के अमौर से सुनील कुमार की रिपोर्ट

Bishnupur Kali Temple History: बिहार के पूर्णिया जिला अंतर्गत अमौर प्रखंड का विष्णुपुर गांव एक ऐतिहासिक और चमत्कारी धार्मिक विरासत को अपने आंचल में समेटे हुए है. यहां स्थित प्राचीन विष्णुपुर काली मंदिर पिछले तीन सदियों (३०० से अधिक वर्षों) से न केवल अमौर, बल्कि पूरे सीमांचल और कोसी क्षेत्र के लाखों श्रद्धालुओं के लिए अगाध आस्था का केंद्र बना हुआ है. इस मंदिर की स्थापना की कड़ियां किसी पौराणिक कथा जैसी लगती हैं, जो आज भी मैथिल संस्कृति और लोक मान्यताओं के अटूट संगम को जीवंत करती हैं. आम दिनों में तो यहां भक्तों का तांता लगा ही रहता है, लेकिन वार्षिक प्रसिद्ध काली पूजा के दौरान यहां होने वाले विशेष अनुष्ठानों की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है.

मायके से ससुराल आई थी दुल्हन, नहीं खुली आंचल की गांठ; जानें पौराणिक कड़ियां

  • दुल्हन का आगमन: करीब ३०० साल पहले अररिया के रानीगंज हांसा इलाके से एक नवविवाहित दुल्हन विदा होकर अमौर के विष्णुपुर गांव आई थी.
  • खोइंछा की रस्म: सनातन और मैथिल संस्कृति के अनुसार, बेटी जब विदा होती है तो मायके की सुख-समृद्धि के प्रतीक रूप में उसके आंचल में ‘खोइंछा’ (अक्षत, खोपरा, हल्दी और सिक्के) बांधा जाता है. ससुराल पहुंचने पर इसे कुलदेवी के स्थान पर चढ़ाने का नियम है.
  • चमत्कारी गांठ: दुल्हन के ससुराल पहुंचने पर घर की महिलाओं ने खोइंछा खोलने का बहुत प्रयास किया, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी कपड़े की वह साधारण सी गांठ टस से मस नहीं हुई और थक-हारकर सबने प्रयास छोड़ दिया.

“पहुंसरा ड्योड़ी की भगवती हूं, यहीं रहूंगी”— जब वृद्ध महिला को आया स्वप्न

“अगली सुबह पड़ोस में रहने वाली एक अत्यंत धार्मिक और बुजुर्ग महिला ने परिजनों को रात में आए एक अलौकिक स्वप्न के बारे में बताया. स्वप्न में साक्षात मां काली ने प्रकट होकर कहा था कि वे पहुंसरा ड्योड़ी की भगवती हैं और इस नवविवाहित बेटी के खोइंछा में समाकर खुद विष्णुपुर आई हैं.”

मां काली ने स्वप्न में निर्देश दिया था कि दुल्हन के घर के ठीक सामने जो छोटा सा बरगद का पेड़ है, वही उनका पसंदीदा स्थान है. उसी पेड़ के नीचे दुल्हन का खोइंछा खोलकर उन्हें स्थापित किया जाए, जिससे पूरे क्षेत्र का कल्याण होगा.

बरगद के नीचे बैठते ही स्वतः खुल गया आंचल; आज भी हरा-भरा है वह विशाल वृक्ष

इस दैवीय संकेत के बाद पूरे विष्णुपुर गांव के प्रबुद्ध लोग एकत्रित हुए और बरगद के पेड़ के नीचे मिट्टी का एक पवित्र पिंडाल (वेदी) बनाया गया. इसके बाद:

  1. स्वतः खुली गांठ: नवविवाहित दुल्हन को पारंपरिक परिधान में उसी बरगद के पेड़ के नीचे लाया गया. जैसे ही विद्वान पंडितों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मां काली का आह्वान और विशेष अनुष्ठान शुरू किया, दुल्हन के आंचल की वह अभेद्य गांठ बिना किसी मानवीय प्रयास के स्वतः ही खुल गई.
  2. पिंड की स्थापना: ग्रामीणों ने खोइंछा की उस पवित्र सामग्री को मां काली का साक्षात स्वरूप मानकर उसी बरगद की छांव तले मिट्टी के पिंड के रूप में स्थापित कर दिया.

सौंदर्यीकरण से बना भव्य मंदिर; अध्यक्ष देवेश नाथ झा बोले— “पूरे क्षेत्र की है मन्नत स्थली”

विष्णुपुर काली मंदिर कमेटी के वर्तमान अध्यक्ष देवेश नाथ झा ने गौरवपूर्वक बताया कि जिस बरगद के पेड़ के नीचे मां स्थापित हुई थीं, वह ऐतिहासिक वृक्ष आज भी एक विशाल और अलौकिक रूप में मंदिर परिसर में विद्यमान है. श्रद्धालु इस वृक्ष को भी साक्षात देव मानकर पूजते हैं.

वर्तमान स्थिति और व्यवस्था:

  • भव्य नवनिर्माण: पूर्व में यह मंदिर बहुत छोटा था और इसकी देखरेख स्थानीय ग्रामीणों की आपसी सहभागिता से होती थी. लेकिन अब चंदे और सहयोग से इसका सौंदर्यीकरण कराकर एक भव्य और आकर्षक मंदिर का रूप दे दिया गया है.
  • मन्नत स्थली: स्थानीय लोगों का अटूट विश्वास है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से मां के दरबार में आकर हाजिरी लगाता है, मां उसकी झोली कभी खाली नहीं रखतीं. विशेषकर नवविवाहित जोड़े आज भी अपनी सुखी दांपत्य जीवन की शुरुआत के लिए सबसे पहले विष्णुपुर ड्योड़ी वाली मैया का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं.

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लेखक के बारे में

Published by: Divyanshu Prashant

दिव्यांशु प्रशांत वर्तमान में Prabhat Khabar डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। उन्होंने महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से पत्रकारिता में परास्नातक तथा टी. एन. बी. कॉलेज भागलपुर से हिंदी साहित्य में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। हिंदी साहित्य की पृष्ठभूमि होने के कारण उन्हें पढ़ने, लेखन और कविता-सृजन में विशेष रुचि है। मीडिया क्षेत्र में लगभग एक वर्ष के अनुभव के दौरान वे Dainik Jagran में न्यूज़ राइटर और रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। करियर के शुरुआती दौर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों से जुड़े पॉलिटिकल कंटेंट राइटिंग का विशेष अनुभव प्राप्त किया। सटीक, निष्पक्ष और प्रभावशाली लेखन के माध्यम से पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुँचाना उनकी पेशेवर पहचान है।

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