पूर्णिया का ऐतिहासिक बाड़ीहाट लक्ष्मी मंदिर: जहाँ विसर्जन से पहले महिलाएं खेलती हैं 'सिंदूर की होली', जानें इसका 79 साल पुराना इतिहास

पूर्णिया शहर के बाड़ीहाट में अवस्थित धन, सुख और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी माता लक्ष्मी का मंदिर अगाध श्रद्धा का केंद्र है. आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व के साथ-साथ स्थानीय नागरिक इस मंदिर को शहर के विकास और खुशहाली का मुख्य आधार मानते हैं. इस मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता विसर्जन से पूर्व महिलाओं द्वारा खेली जाने वाली भव्य 'सिंदूर की होली' है, जो पूरे सीमांचल में कौतूहल और आकर्षण का विषय है.

सच्चे मन से पूजा करने पर दूर होती है दरिद्रता, मिलती है सकारात्मक ऊर्जा

‘आज का दर्शन’ श्रृंखला के तहत बाड़ीहाट लक्ष्मी मंदिर के प्रति जिले वासियों की गहरी आस्था है. श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि जो भी भक्त यहाँ माता लक्ष्मी की सच्चे मन से आराधना करता है, उसके घर-परिवार से दरिद्रता दूर होती है और सुख-शांति व समृद्धि का वास होता है. प्रबुद्ध जनों का मानना है कि देवी लक्ष्मी का यह पावन परिसर भक्तों को एक नई मानसिक ऊर्जा और सकारात्मकता प्रदान करता है.

पूजा के दौरान सजता है आस्था का संसार, 5 दिनों तक रहता है भव्य मेला

पूर्णिया शहर में बाड़ीहाट ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहां हर साल माता लक्ष्मी की पूजा बेहद व्यापक और भव्य पैमाने पर आयोजित की जाती है:

  • श्रद्धालुओं का सैलाब: उत्सव के दौरान यहाँ पूरे शहर और ग्रामीण इलाकों के लोगों का जनसैलाब उमड़ पड़ता है. हर कोई मां लक्ष्मी के अलौकिक दर्शन के लिए बेताब नजर आता है.
  • आकर्षण का केंद्र: पांच दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव के लिए पूरे मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र को आधुनिक लाइटों और फूलों से दुल्हन की तरह सजाया जाता है, जिससे यह स्थल आकर्षण का मुख्य केंद्र बन जाता है.

पति की लंबी उम्र के लिए विवाहित महिलाएं खेलती हैं सिंदूर की होली

इस पूजा का सबसे भावुक और मुख्य आकर्षण विसर्जन से ठीक पहले होने वाली सिंदूर की होली है. प्रतिमा विसर्जन के दिन बड़ी संख्या में विवाहित (सुहागिन) महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में माता के दरबार में एकत्रित होती हैं और विधि-विधान से मां की अंतिम पूजा-अर्चना करती हैं. इसके बाद, महिलाएं सर्वप्रथम माता के चरणों और माथे पर सिंदूर अर्पित करती हैं. फिर शुरू होता है सिंदूर की होली का अनोखा उत्सव, जहां महिलाएं एक-दूसरे के माथे और गालों पर सिंदूर लगाकर हंसी-खुशी होली खेलती हैं. इस रस्म के पीछे महिलाओं का मुख्य उद्देश्य अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और परिवार की सलामती की प्रार्थना करना होता है. अंत में, सभी महिलाएं नम आंखों से मां को अगले वर्ष पुनः आने का निमंत्रण देते हुए श्रद्धापूर्वक विदा करती हैं.

मीना बाजार और ग्रामीण संस्कृति का अनूठा संगम है यहाँ का मेला

लक्ष्मी पूजा के अवसर पर यहाँ वर्षों से एक विशाल मेले का आयोजन होता आ रहा है. इस मेले में जहां एक ओर ग्रामीण संस्कृति जीवंत उठती है, वहीं दूसरी ओर शहर की आधुनिकता की झलक भी देखने को मिलती है. मेले में बच्चों के मनोरंजन के लिए बड़े-बड़े झूले और खिलौनों की दुकानें सजाई जाती हैं. इसके अलावा, महिलाओं के लिए विशेष रूप से ‘मीना बाजार’ सजता है, जहां घरेलू बर्तनों, सौंदर्य सामग्रियों और पूजन सामग्रियों के दर्जनों स्टॉल लगाए जाते हैं.

देश की आजादी के साथ जुड़ा है इतिहास, 1948 में पड़ी थी नींव

बाड़ीहाट लक्ष्मी पूजा का इतिहास देश की आजादी के गौरवशाली कालखंड से जुड़ा हुआ है, जो करीब 79 साल पुराना है. हमारा देश सन 1947 में आजाद हुआ था और उसके ठीक एक वर्ष बाद, यानी सन 1948 में बाड़ीहाट में माता लक्ष्मी की पूजा का शुभारंभ किया गया था. उस दौर में स्वर्गीय नूनू सिंह, स्वर्गीय लक्ष्मी नारायण सिंह, शिवनाथ सिंह और रूपलाल पांडेय सहित समाज के कई प्रबुद्ध व राष्ट्रवादी दिग्गजों ने मिलकर इस पूजा की नींव रखी थी. आज भले ही इस पूजा को शुरू करने वाले कई मार्गदर्शक हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा स्थापित की गई यह पावन सांस्कृतिक परंपरा आज भी उसी गरिमा और अनवरत रूप से फल-फूल रही है.

पूर्णिया से अखिलेश चन्द्रा की रिपोर्ट:

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Published by: Divyanshu Prashant

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