Aaj Ka Darshan: पूर्णिया से अखिलेश चन्द्रा की रिपोर्ट. पूर्णिया का गुलाबबाग सिर्फ व्यापार और कारोबार के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी गहरी धार्मिक आस्था के लिए भी पहचान रखता है. लक्ष्मी नगरी कहे जाने वाले इस इलाके में स्थित शनिदेव मंदिर हर शनिवार को भक्तों की श्रद्धा का बड़ा केंद्र बन जाता है. यहां ग्रहों की शांति, सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए सुबह से देर शाम तक श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगी रहती है.
जहां व्यापार के साथ बसती है आस्था की दुनिया
गुलाबबाग को पूर्णिया का सबसे बड़ा कारोबारी इलाका माना जाता है. यही वजह है कि लोग इसे लक्ष्मी नगरी के नाम से भी जानते हैं. लेकिन इस व्यापारिक हलचल के बीच भगवान शनिदेव का यह मंदिर लोगों को आध्यात्मिक सुकून भी देता है.
मंदिर के प्रति व्यापारियों से लेकर आम लोगों तक की गहरी आस्था जुड़ी हुई है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा करने पर शनिदेव भक्तों के जीवन से कष्ट और बाधाएं दूर कर देते हैं. हर शनिवार को लोग यहां तेल का अभिषेक करते हैं और विशेष पूजा-अर्चना के जरिए शनिदेव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.
शनिवार को दिखता है भक्ति का अनोखा रंग
शनिवार के दिन मंदिर परिसर पूरी तरह भक्तिमय माहौल में डूब जाता है. सुबह से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है और देर शाम तक पूजा-पाठ का सिलसिला चलता रहता है. मंदिर में पूजा करने पहुंचे लोगों का कहना है कि यहां आने से मन को शांति मिलती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव महसूस होता है.
मंदिर के आसपास का इलाका भी शनिवार को पूरी तरह धार्मिक रंग में रंग जाता है. कई श्रद्धालु परिवार सहित यहां पहुंचते हैं और पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं.
सावन अमावस्या पर सजता है भव्य उत्सव
गुलाबबाग के इस शनि मंदिर में सावन अमावस्या के अवसर पर शनि जयंती धूमधाम से मनायी जाती है. इस दौरान मंदिर को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है और खिचड़ी महाभोग का आयोजन होता है. रात्रि जागरण और भजन-कीर्तन से पूरा माहौल भक्तिमय हो उठता है.
इस खास अवसर पर बुंदिया और पेड़ा का चढ़ावा चढ़ाने की परंपरा भी निभायी जाती है. शहर से बाहर रहने वाले लोग भी इस दिन विशेष रूप से यहां पहुंचते हैं.
सात दशक पुरानी है मंदिर की विरासत
मंदिर के पुरोहित शंकर लाल भार्गव बताते हैं कि इस शनि मंदिर की स्थापना वर्ष 1955-60 के बीच हुई थी. उनके चाचा मांगीलाल भार्गव ने इसकी नींव रखी थी. समय के साथ मंदिर का विस्तार होता गया और आज यह इलाके की प्रमुख धार्मिक पहचान बन चुका है.
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