पूर्णिया : शहर के नवरतन हाता में डीएसए ग्राउंड के ठीक बगल में मां काली का दरबार सजता है. पूरे शहर में यही वह पूजन स्थल है जहां मां काली की विशाल प्रतिमा लगायी जाती है. इस काली स्थान का इतिहास करीब 54 साल पुराना है और आज भी यहां पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की जाती है।
पूजन की बंग्ला संस्कृति : नवरतन काली स्थान में पूजन में बंग्ला संस्कृति की छाप साफ नजर आती है. प्रतिमा के साथ-साथ पूजा के मंत्रोच्चार में भी ऐसा ही देखा जाता है. स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां शुरू से ही दक्षिणेश्वर काली की पूजा होती है जिसके लिए बंगाल प्रसिद्ध है. इतना ही नहीं, प्रतिमा के निर्माण के लिए बंगाल के मालदा से ही मूर्तिकार बुलाए जाते हैं. यही वजह है कि मां के दर्शन के लिए यहां दूर-दराज के लोग आते हैं.
सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम : नवरतन काली स्थान में पूजा के अवसर पर बड़े पैमाने पर कला और संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. इस अवसर पर बच्चों की कला प्रतिभा को अहमियत दी जाती है. संरक्षिका शशिकला देवी, अध्यक्ष सुमन डागा, सचिव सुजाता मंडल, कोषाध्यक्ष श्वेता पंसारी, सदस्य हरिओम झा समेत अन्य इस पूजनोत्सव के लिए जुटे हुए हैं. कोशिश यह की जाती है कि इस उत्सव से हर तबके का जुड़ाव हो जाये.
क्या है इतिहास
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, सन् 1965 में यहां पूजन की परंपरा शुरू हुई. बुजुर्ग बताते हैं कि पहले बंकिम चन्द्र घोष के पुत्र बच्चू घोष ने अपने घर पर ही पूजा की शुरुआत की थी. करीब पांच वर्षों तक यहीं पूजा हुई. इसके बाद यह पूजा एक समिति के प्रांगण में होने लगी पर तीन साल बाद वर्तमान स्थल पर पूजा का आयोजन होने लगा. उस समय अलख घोष, कन्हाई पाल, टोकन संटू दास, दिलीप कुमार घोष आदि ने आपसी सहयोग से परम्परा को आगे बढ़ाया. पूजन के इस आयोजन में पूरे समाज के लोग आगे आये और सक्रिय भागीदारी निभाते हुए मां का दरबार सजाना शुरू कर दिया.
बनती है विशाल प्रतिमा
इस काली स्थान में देवी की प्रतिमा काफी विशाल बनायी जाती है. लगभग दस से बारह फीट लंबी और करीब तीन फीट गोलाई के आकार में बनने वाली इस प्रतिमा को देखने के लिए भक्त दूर-दराज से यहां आते हैं और यही यहां के आकर्षण का केंद्र है. हालांकि पहले इतनी विशाल प्रतिमा नहीं बनती थी किंतु 1990 से प्रतिमा को यह स्वरूप दिया गया. स्थानीय लोग इसे बम काली का भी नाम देते हैं.
