Bihar Flood : पटना में गंगा के किनारे बसे दियारा इलाकों में बाढ़ ने लोगों की जिंदगी पूरी तरह बदल दी है. पानी बढ़ते ही लोगों को अपने घर, खेत और रोजी-रोटी छोड़कर परिवार, बच्चों और मवेशियों के साथ सुरक्षित जगहों की ओर पलायन करना पड़ता है. कई परिवार पटना के मरीन ड्राइव और एलसीटी घाट जैसे इलाकों में पहुंचकर कपड़े, साड़ी और प्लास्टिक से छोटे-छोटे अस्थाई टेंट बनाकर रहने को मजबूर हैं.
गंगा का पानी कम होता है तो यही परिवार फिर अपने दियारा इलाके में लौट जाते हैं. बाढ़ और विस्थापन का यह सिलसिला इनके लिए कोई नई बात नहीं है, बल्कि सालों से उनकी जिंदगी का हिस्सा बना हुआ है.
खेती और काम बंद, मवेशियों के चारे तक के पैसे नहीं
बाढ़ का पानी सिर्फ घरों तक नहीं पहुंचा, बल्कि इन परिवारों की पूरी अर्थव्यवस्था को भी डुबो गया है. खेत पानी में डूबे हैं और रोज कमाकर खाने वाले लोगों का काम-धंधा भी ठप है. ऐसे में परिवार के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है.
हालात इतने खराब हैं कि कई परिवारों के पास अपनी गाय, बछिया और बकरियों के लिए चारा खरीदने तक के पैसे नहीं हैं. बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि पानी बढ़ने के साथ उनकी मुश्किलें भी बढ़ती जाती हैं, लेकिन उनके पास इससे निकलने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है.
राशन के सहारे जिंदगी, बच्चों की पढ़ाई भी छूटी
बाढ़ पीड़ितों की शिकायत है कि आपदा के समय उन्हें अलग से पर्याप्त राशन या विशेष राहत नहीं मिलती. उनका कहना है कि बाढ़ के दिनों में भी वही नियमित राशन मिलता है, जो सामान्य दिनों में मिलता है. कुछ परिवारों को तो मिलने वाला मुफ्त 5 किलो अनाज भी नहीं मिल पा रहा है.
सबसे बड़ा सवाल इन परिवारों के बच्चों के भविष्य का है. गांधी मैदान से महज 100 से 200 मीटर की दूरी पर रहने वाली इस बस्ती में स्कूल तक नहीं है. कोमल जैसी कई बच्चियां पढ़ना चाहती हैं, लेकिन स्कूल की दूरी और भारी ट्रैफिक वाली सड़कों का डर उन्हें पढ़ाई से दूर कर देता है.
वोट देते हैं, दस्तावेज हैं, फिर भी नहीं मिला स्थायी ठिकाना
बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि उनके पास आधार कार्ड, वोटर आईडी और निवास प्रमाण पत्र हैं. वे चुनाव में वोट भी देते हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके पुनर्वास की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी है.
भूमिहीन परिवारों को जमीन देने के सरकारी वादे भी इन लोगों को अब तक राहत नहीं दे पाए हैं. उनका आरोप है कि उनकी समस्याओं पर लगातार बात तो होती है, लेकिन जमीन पर हालात नहीं बदलते.
सवाल सिर्फ बाढ़ का नहीं, सम्मान के साथ जिंदगी का है
इन परिवारों का दर्द सिर्फ बाढ़ के पानी तक सीमित नहीं है. उनका सवाल है कि हर साल उन्हें अपना घर छोड़कर टेंट में क्यों रहना पड़ता है, उनके बच्चों को स्कूल क्यों नहीं मिल सकता और बाढ़ के समय परिवार के लिए पर्याप्त राशन की व्यवस्था क्यों नहीं होती.
कई लोगों का कहना है कि पत्रकारों के लगातार वीडियो और रिपोर्टिंग के बावजूद उनकी स्थिति जस की तस बनी हुई है. पक्के मकानों में रहने वाले लोगों को सुविधाएं मिलने की बात करते हुए बाढ़ पीड़ित सवाल उठाते हैं कि आखिर गरीबों के लिए स्थायी समाधान कब निकलेगा.