Patna News : पटना जिले के फुलवारी शरीफ के ऐतिहासिक संगत स्थित माता मंदिर से रविवार की शाम साढ़े सात बजे 209वें वर्ष की ऐतिहासिक माता की डाली खप्पड़ पूजा निकाली गई. खप्पड़ में प्रज्वलित हवन की अग्नि लेकर पुजारी सबसे आगे दौड़ते रहे और उनके पीछे हजारों श्रद्धालुओं का आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा. करीब डेढ़ किलोमीटर की नगर परिक्रमा के बाद लगभग आधे घंटे में खप्पड़ वापस मंदिर पहुंचा, जहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ अनुष्ठान संपन्न हुआ.
हाथों में तलवार-भाला, जय काली के जयकारों से गूंजा फुलवारी
खप्पड़ निकलते ही महिला, पुरुष, युवा, बुजुर्ग और बच्चे बड़ी संख्या में नगर परिक्रमा में शामिल हो गए. कई श्रद्धालुओं के हाथों में तलवार, भाला, लाठी, डंडा और त्रिशूल थे. लोग लगातार जय काली, जय माता दी और माता के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ते रहे. बड़ी संख्या में लोग सड़क किनारे, घरों की छतों और आसपास की इमारतों से इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए जुटे रहे.
हवन की अग्नि के साथ होती है नगर परिक्रमा
भव्य पूजन और हवन के बाद मंदिर के पुजारी खप्पड़ में प्रज्वलित अग्नि लेकर नगर परिक्रमा के लिए निकलते हैं. उनके पीछे श्रद्धालु दौड़ते हुए माता के जयकारे लगाते हैं. करीब डेढ़ किलोमीटर की परिक्रमा पूरी करने के बाद खप्पड़ मंदिर परिसर में वापस आता है. खप्पड़ निकलने से लेकर नगर भ्रमण और मंदिर वापसी तक की पूरी प्रक्रिया करीब आधे घंटे में पूरी होती है.
पूजा से घंटों पहले जुटने लगी थी भीड़
माता की डाली खप्पड़ पूजा को लेकर मंदिर परिसर और आसपास के इलाके में कई घंटे पहले से ही श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी थी. पूजा संपन्न होने के बाद भी प्रसाद लेने के लिए लोगों की कतार लगी रही. देवी स्थान समिति के सचिव देवेंद्र प्रसाद ने बताया कि इस बार खप्पड़ पूजा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 70 हजार से अधिक रही.
1818 में महामारी के दौरान शुरू हुई थी परंपरा
खप्पड़ पूजा को लेकर प्रचलित मान्यता के अनुसार करीब दो सौ साल पहले फुलवारी शरीफ और आसपास के इलाकों में भयंकर महामारी फैली थी. बड़ी संख्या में लोगों की मौत के बाद इलाके में भय का माहौल था. मान्यता है कि उस समय मंदिर के पुजारी झमेली बाबा को मां काली ने स्वप्न में दर्शन देकर खप्पड़ पूजा निकालने का निर्देश दिया था.
कहा जाता है कि इसके बाद झमेली बाबा ने मां काली की आज्ञा का पालन करते हुए खप्पड़ में प्रज्वलित अग्नि के साथ नगर परिक्रमा की. स्थानीय मान्यता के अनुसार इसके बाद महामारी का प्रकोप धीरे-धीरे समाप्त हो गया. तभी से यह परंपरा चली आ रही है. आयोजकों के अनुसार सन 1818 से शुरू हुई यह पूजा इस वर्ष 209वें वर्ष में पहुंच गई है.
हिंदू-मुस्लिम मिलकर निभाते हैं जिम्मेदारी
फुलवारी शरीफ की इस ऐतिहासिक पूजा की खासियत सांप्रदायिक सौहार्द भी है. पूजा के आयोजन में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर सहयोग करते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि और स्थानीय लोग आयोजन को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने में अपनी भूमिका निभाते हैं.
सुरक्षा के लिए चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात
खप्पड़ पूजा को लेकर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे. रैपिड एक्शन फोर्स, बिहार सैन्य पुलिस और जिला पुलिस के जवानों के अलावा बड़ी संख्या में पुलिस पदाधिकारी तैनात रहे. जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, नगर पुलिस अधीक्षक, पुलिस उपाधीक्षक और विभिन्न थानों के थानाध्यक्ष सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी करते रहे.
श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए बदला गया ट्रैफिक रूट
नगर परिक्रमा के दौरान भारी भीड़ को देखते हुए यातायात व्यवस्था में भी बदलाव किया गया था. पटना की ओर आने-जाने वाले वाहनों को एहतियातन करीब दो किलोमीटर पहले रोककर कई वाहनों को डायवर्ट किया गया. प्रशासन की मुस्तैदी से हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी के बावजूद खप्पड़ पूजा और नगर परिक्रमा शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुई.
रविवार को फुलवारी शरीफ में आस्था, परंपरा और आपसी भाईचारे का अद्भुत नजारा देखने को मिला. आगे-आगे हवन की प्रज्वलित अग्नि लिए दौड़ते पुजारी और पीछे उमड़ता श्रद्धालुओं का सैलाब पूरे इलाके को जय काली और जय माता दी के जयकारों से गुंजायमान करता रहा.
