VVAN Devi Temple Story : घना जंगल, चारों तरफ सन्नाटा और इसी जंगल के बीच विराजमान हैं वन देवी मां. बिहार का यह प्राचीन सिद्ध पीठ मंदिर आस्था के साथ-साथ अपनी रहस्यमयी कहानियों के लिए भी जाना जाता है. मान्यता है कि यहां मां का मिट्टी का पिंड सदियों से उसी स्वरूप में सुरक्षित है.
विंध्याचल से जंगल तक पहुंचीं मां
बताया जाता है कि करीब 1648 ईस्वी में साकद्वीपीय ब्राह्मण पंडित विद्यानंद मिश्र मां को विंध्याचल से सिद्ध करके इस निर्जन जंगल में लेकर आए थे. यहां उन्होंने मां को मिट्टी के पिंड के रूप में स्थापित किया.
समय बीतता गया, कई प्राकृतिक आपदाएं आईं, लेकिन मान्यता है कि मां का यह मिट्टी का पिंड आज भी अपने मूल स्वरूप में सुरक्षित है. वर्ष 1955 से 1958 के बीच संत भगवान दास त्यागी ने यहां महायज्ञ कराया. इसी दौरान मां की प्रेरणा से पिंड की सुरक्षा के लिए मंदिर का निर्माण कराया गया.
अघोरी और बाबा विद्यानंद से जुड़ी कहानी
वन देवी मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित कहानियों में एक शास्त्रार्थ की भी है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, एक अघोरी ने अपने लकड़ी के दंड को भेड़ का रूप देकर उससे संस्कृत बुलवाई थी.
इसके जवाब में बाबा विद्यानंद मिश्र ने मिट्टी के मटके, जिसे कनखा कहा जाता है, को स्पर्श किया और उससे संस्कृत में शास्त्रार्थ कराया. कहा जाता है कि इसके बाद भी इस स्थान से जुड़ी कई रहस्यमयी घटनाओं की चर्चा होती रही.
रात में जंगल में चमकती थी तेज रोशनी
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बाबा विद्यानंद और उस अघोरी के निधन के बाद भी उनके सूक्ष्म रूपों के बीच द्वंद्व होने की बात कही जाती थी. लोगों के अनुसार, रात के समय घने जंगल के बीच अचानक तेज रोशनी दिखाई देती थी. हालांकि इन घटनाओं को लेकर अलग-अलग मान्यताएं और कथाएं प्रचलित हैं.
64 नागों की कहानी ने बढ़ाया रहस्य
साल 1961 की एक घटना भी वन देवी मंदिर के रहस्यों से जोड़ी जाती है. बताया जाता है कि महंत जमुना दास जी के सामने एक-एक करके 64 सांप आए. महंत उन्हें मारने लगे, तभी मान्यता के अनुसार मां ने सशरीर दर्शन देकर उन्हें रोक दिया.
कहा जाता है कि मां ने बताया कि ये सांप उनकी रक्षिकाएं और सेविकाएं हैं. इसके बाद यह घटना मंदिर की चर्चित मान्यताओं में शामिल हो गई.
साधकों को सुनाई देती है पायल की आवाज
स्थानीय शोधकर्ता चंद्रशेखर की पुस्तक 'गाथा वन देवी महाधाम' में भी मंदिर से जुड़ी कई अनुभूतियों का उल्लेख किया गया है. इसमें साधकों द्वारा मां के चार भुजाधारी स्वरूप के दर्शन और नूपुर यानी पायल की आवाज सुनाई देने जैसी बातों का जिक्र है. मान्यता है कि मां का यह स्वरूप लक्ष्मी और सरस्वती के स्वरूप का संयोजन है.
शाम ढलते ही क्यों बढ़ जाता है रहस्य
वन देवी मंदिर को लेकर यह भी मान्यता है कि शाम ढलने के बाद मंदिर परिसर में एक अलग तरह का भय महसूस होता है. इसी वजह से असमय या रात में अकेले मंदिर परिसर में जाना वर्जित माना जाता है.
पुराने समय में यहां मंदिर की छत को छूती करीब 8 फीट लंबी आकृति दिखाई देने जैसी बातें भी सामने आने की चर्चा रही है.
जागरण में बालिका रूप में मां के दर्शन की मान्यता
धार्मिक उत्सव और जागरण के दौरान भी वन देवी मंदिर को लेकर अलग मान्यता है. कहा जाता है कि इन मौकों पर मां स्वयं बालिका का रूप धारण कर परिसर में विचरण करती हैं और श्रद्धालुओं की रक्षा करती हैं.
आस्था, प्राचीन इतिहास और रहस्यमयी घटनाओं से जुड़ी ये कथाएं वन देवी मंदिर को दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती हैं. यही वजह है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान सिर्फ पूजा का केंद्र नहीं, बल्कि रहस्य और विश्वास से जुड़ा एक अनोखा धाम भी माना जाता है.