चक्रव्यूह में दीपक प्रकाश, निशाने पर उपेंद्र, चिराग ने खोले पत्ते, अब सबकी नजर राजद पर

Bihar MLC Election: बिहार विधान परिषद चुनाव में उम्मीदवारों की घोषणा के बाद सियासी समीकरण और रोचक हो गए हैं. एनडीए ने अधिकांश सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए हैं, जबकि एक सीट को लेकर चर्चा जारी है. इस बीच उपेंद्र कुशवाहा के बेटे की संभावित उम्मीदवारी और विपक्षी वोटों की भूमिका पर सबकी नजरें टिकी हैं.

Bihar MLC Election, मिथिलेश: बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के लिए हो रहा चुनाव दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है. द्विवार्षिक चुनाव की 9 सीटों में एनडीए के तीन घटक दल भाजपा, जदयू और चिराग पासवान की पार्टी लोजपा (आर) ने 9 सीटों के लिए अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं. बची एक सीट पर राजद अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है.

विधानसभा में राजद के 25 विधायक हैं. ऐसी स्थिति में यदि राजद विधायक दल एकजुट रहा तो उसके एक उम्मीदवार की जीत तय मानी जा रही है. मगर, बेटे की उम्मीदवारी को लेकर आश्वस्त दिख रहे एनडीए के चौथे घटक दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के सामने 9वें उम्मीदवार के रूप में बेटे को मैदान में उतारने का विकल्प बचा है.

यह पूछे जाने पर कि अब आगे क्या करेंगे, उपेंद्र कुशवाहा ने कहा, “इंतजार करिए, अभी बहुत समय है.”

लोजपा (आर) ने अशरफ अंसारी को बनाया उम्मीदवार

शनिवार को चिराग पासवान की पार्टी लोजपा (आर) ने अपने एकमात्र उम्मीदवार अशरफ अंसारी के नाम की घोषणा कर दी. अशरफ पार्टी नेता रामविलास पासवान के समय से ही लोजपा से जुड़े रहे हैं और फिलहाल पार्टी के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष हैं.

एनडीए के पास हैं तीन सरप्लस वोट

लोजपा (आर) के उम्मीदवार घोषित होने के बाद एनडीए कोटे की सीटें लगभग पूरी हो गई हैं. विधानसभा में एनडीए के 202 विधायक हैं. एक सीट जीतने के लिए करीब 25 विधायकों के वोट की जरूरत है.

ऐसे में एनडीए के 8 उम्मीदवारों-भाजपा के 4, जदयू के 3 और लोजपा (आर) के 1 उम्मीदवार को जिताने के लिए 200 विधायकों के वोट चाहिए होंगे.

पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की खाली सीट पर जदयू ने ललन प्रसाद को उम्मीदवार बनाया है. इस सीट पर चुनाव की नौबत नहीं आने की पूरी संभावना है. यानी यह सीट जदयू के खाते में निर्विरोध जा सकती है.

उपेंद्र कुशवाहा के सामने क्या विकल्प हैं?

उपेंद्र कुशवाहा के सामने अब जो विकल्प बचा है, उसमें वे अपने बेटे दीपक प्रकाश को खुद के दम पर उम्मीदवार बना सकते हैं. यदि वे यह रास्ता अपनाते हैं तो पर्दे के पीछे से एनडीए उनकी मदद कर सकता है. एनडीए की नजर राजद के असंतुष्ट विधायकों पर हो सकती है.

राज्यसभा चुनाव के दौरान भी राजद के तीन विधायकों ने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के पक्ष में वोट नहीं देकर अलग संकेत दिया था. यदि मौजूदा समय में भी उनकी नाराजगी दूर नहीं हुई, तो मतदान के समय पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है. ऐसी स्थिति में बिखरे हुए वोटों पर एनडीए के संभावित 9वें उम्मीदवार की नजर हो सकती है.

विपक्ष के 16 विधायक भी बदल सकते हैं समीकरण

इसके अलावा विपक्ष के कुछ ऐसे विधायक भी हैं, जिन पर दोनों पक्षों की नजर है. इनमें इंडियन इन्क्लूसिव पार्टी के आईपी गुप्ता, बसपा के सतीश सिंह यादव, कांग्रेस के 6 विधायक, एआईएमआईएम के 5 विधायक और वाम दलों के 3 विधायक शामिल हैं.

इनकी कुल संख्या 16 होती है. यदि ये वोट एकमुश्त या बिखराव की स्थिति में जाते हैं, तो एनडीए और राजद दोनों को लाभ या नुकसान हो सकता है.

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विधान परिषद नहीं पहुंचे तो मंत्री पद पर संकट

यदि इस बार पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद की सदस्यता नहीं मिली, तो उन्हें मंत्री पद गंवाना पड़ सकता है. संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार कोई भी व्यक्ति मंत्री बनने के छह महीने के भीतर राज्य विधानमंडल के किसी एक सदन का सदस्य बनना अनिवार्य है.

दीपक प्रकाश मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार में पिछले महीने मंत्री बनाए गए हैं. यदि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं बनते हैं, तो चार महीने बाद उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है.

विधानसभा का रास्ता भी खुला

दीपक प्रकाश के सामने मंत्री बने रहने के लिए दूसरा विकल्प विधानसभा का भी है. यदि ऐसी स्थिति बनती है, तो पार्टी के चार विधायकों में से कोई एक उनके लिए सीट खाली कर सकता है. इसके बाद उपचुनाव के जरिए उन्हें विधायक बनने का मौका मिल सकता है.

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Published by: Paritosh Shahi

परितोष शाही पिछले 4 वर्षों से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की और वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल की बिहार टीम का हिस्सा हैं. राजनीति, सिनेमा और खेल, विशेषकर क्रिकेट में उनकी गहरी रुचि है. जटिल खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना और बदलते न्यूज माहौल में तेजी से काम करना उनकी विशेषता है. परितोष शाही ने पत्रकारिता की पढ़ाई बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से की. पढ़ाई के दौरान ही पत्रकारिता की बारीकियों को समझना शुरू कर दिया था. खबरों को देखने, समझने और लोगों तक सही तरीके से पहुंचाने की सोच ने शुरुआत से ही इस क्षेत्र की ओर आकर्षित किया. पत्रकारिता में करियर की पहली बड़ी शुरुआत बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान हुई, जब उन्होंने जन की बात के साथ इंटर्नशिप की. इस दौरान बिहार के 26 जिलों में जाकर सर्वे किया. यह अनुभव काफी खास रहा, क्योंकि यहां जमीनी स्तर पर राजनीति, जनता के मुद्दों और चुनावी माहौल को बहुत करीब से समझा. इसी अनुभव ने राजनीतिक समझ को और मजबूत बनाया. इसके बाद राजस्थान पत्रिका में 3 महीने की इंटर्नशिप की. यहां खबर लिखने की असली दुनिया को करीब से जाना. महज एक महीने के अंदर ही रियल टाइम न्यूज लिखने लगे. इस दौरान सीखा कि तेजी के साथ-साथ खबर की सटीकता कितनी जरूरी होती है. राजस्थान पत्रिका ने उनके अंदर एक मजबूत डिजिटल पत्रकार की नींव रखी. पत्रकारिता के सफर में आगे बढ़ते हुए पटना के जनता जंक्शन न्यूज पोर्टल में वीडियो प्रोड्यूसर के रूप में भी काम किया. यहां कैमरे के सामने बोलना, प्रेजेंटेशन देना और वीडियो कंटेंट की बारीकियां सीखीं. करीब 6 महीने के इस अनुभव ने कैमरा फ्रेंडली बनाया और ऑन-स्क्रीन प्रेजेंस को मजबूत किया. 1 अप्रैल 2023 को राजस्थान पत्रिका को प्रोफेशनल तौर पर ज्वाइन किया. यहां 17 महीने में कई बड़े चुनावी कवरेज में अहम भूमिका निभाई. लोकसभा चुनाव 2024 में नेशनल टीम के साथ जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला. इसके अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान भी स्टेट टीम के साथ मिलकर काम किया. इस दौरान चुनावी रणनीति, राजनीतिक घटनाक्रम और बड़े मुद्दों पर काम करने का व्यापक अनुभव मिला. फिलहाल परितोष शाही प्रभात खबर डिजिटल बिहार टीम के साथ जुड़े हुए हैं. यहां बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान कई बड़ी खबरों को रियल टाइम में ब्रेक किया, ग्राउंड से जुड़े मुद्दों पर खबरें लिखीं और वीडियो भी बनाए. बिहार चुनाव के दौरान कई जिलों में गांव- गांव घूम कर लोगों की समस्या को जाना-समझा और उनके मुद्दे को जन प्रतिनिधियों तक पहुंचाया. उनकी कोशिश हमेशा यही रहती है कि पाठकों और दर्शकों तक सबसे पहले, सही और असरदार खबर पहुंचे. पत्रकारिता में लक्ष्य लगातार सीखते रहना, खुद को बेहतर बनाना और भरोसेमंद पत्रकार के रूप में अपनी पहचान मजबूत करना है.

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