Bihar MLC Election, मिथिलेश: बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के लिए हो रहा चुनाव दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है. द्विवार्षिक चुनाव की 9 सीटों में एनडीए के तीन घटक दल भाजपा, जदयू और चिराग पासवान की पार्टी लोजपा (आर) ने 9 सीटों के लिए अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं. बची एक सीट पर राजद अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है.
विधानसभा में राजद के 25 विधायक हैं. ऐसी स्थिति में यदि राजद विधायक दल एकजुट रहा तो उसके एक उम्मीदवार की जीत तय मानी जा रही है. मगर, बेटे की उम्मीदवारी को लेकर आश्वस्त दिख रहे एनडीए के चौथे घटक दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के सामने 9वें उम्मीदवार के रूप में बेटे को मैदान में उतारने का विकल्प बचा है.
यह पूछे जाने पर कि अब आगे क्या करेंगे, उपेंद्र कुशवाहा ने कहा, “इंतजार करिए, अभी बहुत समय है.”
लोजपा (आर) ने अशरफ अंसारी को बनाया उम्मीदवार
शनिवार को चिराग पासवान की पार्टी लोजपा (आर) ने अपने एकमात्र उम्मीदवार अशरफ अंसारी के नाम की घोषणा कर दी. अशरफ पार्टी नेता रामविलास पासवान के समय से ही लोजपा से जुड़े रहे हैं और फिलहाल पार्टी के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष हैं.
एनडीए के पास हैं तीन सरप्लस वोट
लोजपा (आर) के उम्मीदवार घोषित होने के बाद एनडीए कोटे की सीटें लगभग पूरी हो गई हैं. विधानसभा में एनडीए के 202 विधायक हैं. एक सीट जीतने के लिए करीब 25 विधायकों के वोट की जरूरत है.
ऐसे में एनडीए के 8 उम्मीदवारों-भाजपा के 4, जदयू के 3 और लोजपा (आर) के 1 उम्मीदवार को जिताने के लिए 200 विधायकों के वोट चाहिए होंगे.
पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की खाली सीट पर जदयू ने ललन प्रसाद को उम्मीदवार बनाया है. इस सीट पर चुनाव की नौबत नहीं आने की पूरी संभावना है. यानी यह सीट जदयू के खाते में निर्विरोध जा सकती है.
उपेंद्र कुशवाहा के सामने क्या विकल्प हैं?
उपेंद्र कुशवाहा के सामने अब जो विकल्प बचा है, उसमें वे अपने बेटे दीपक प्रकाश को खुद के दम पर उम्मीदवार बना सकते हैं. यदि वे यह रास्ता अपनाते हैं तो पर्दे के पीछे से एनडीए उनकी मदद कर सकता है. एनडीए की नजर राजद के असंतुष्ट विधायकों पर हो सकती है.
राज्यसभा चुनाव के दौरान भी राजद के तीन विधायकों ने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के पक्ष में वोट नहीं देकर अलग संकेत दिया था. यदि मौजूदा समय में भी उनकी नाराजगी दूर नहीं हुई, तो मतदान के समय पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है. ऐसी स्थिति में बिखरे हुए वोटों पर एनडीए के संभावित 9वें उम्मीदवार की नजर हो सकती है.
विपक्ष के 16 विधायक भी बदल सकते हैं समीकरण
इसके अलावा विपक्ष के कुछ ऐसे विधायक भी हैं, जिन पर दोनों पक्षों की नजर है. इनमें इंडियन इन्क्लूसिव पार्टी के आईपी गुप्ता, बसपा के सतीश सिंह यादव, कांग्रेस के 6 विधायक, एआईएमआईएम के 5 विधायक और वाम दलों के 3 विधायक शामिल हैं.
इनकी कुल संख्या 16 होती है. यदि ये वोट एकमुश्त या बिखराव की स्थिति में जाते हैं, तो एनडीए और राजद दोनों को लाभ या नुकसान हो सकता है.
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विधान परिषद नहीं पहुंचे तो मंत्री पद पर संकट
यदि इस बार पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद की सदस्यता नहीं मिली, तो उन्हें मंत्री पद गंवाना पड़ सकता है. संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार कोई भी व्यक्ति मंत्री बनने के छह महीने के भीतर राज्य विधानमंडल के किसी एक सदन का सदस्य बनना अनिवार्य है.
दीपक प्रकाश मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार में पिछले महीने मंत्री बनाए गए हैं. यदि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं बनते हैं, तो चार महीने बाद उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है.
विधानसभा का रास्ता भी खुला
दीपक प्रकाश के सामने मंत्री बने रहने के लिए दूसरा विकल्प विधानसभा का भी है. यदि ऐसी स्थिति बनती है, तो पार्टी के चार विधायकों में से कोई एक उनके लिए सीट खाली कर सकता है. इसके बाद उपचुनाव के जरिए उन्हें विधायक बनने का मौका मिल सकता है.
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