एडवोकेट राकेश कुमार सिंह, चेयरमैन- भारत उत्थान संघ, महाराणा प्रताप फाउंडेशन, खाना चाहिए फाउंडेशन
जब आपको लगता है कि आप बिहार को समझ गए हैं... बिहार आपको झटका देता है." वेब सीरीज महारानी का यह संवाद बांकीपुर उपचुनाव के बाद फिर याद आ रहा है. वजह सिर्फ जन सुराज की जीत नहीं है. वजह यह है कि बिहार ने एक बार फिर साबित किया कि यहां पुराने राजनीतिक हिसाब किताब हर चुनाव में नहीं चलते. करीब तीस साल से बांकीपुर बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा. ऐसे में प्रशांत किशोर और जन सुराज की जीत स्वाभाविक तौर पर बड़ी खबर है. लेकिन इस नतीजे को सीधे बीजेपी के जनाधार के खत्म होने का प्रमाण मान लेना भी उतनी ही बड़ी भूल होगी.
इस चुनाव की असली कहानी उम्मीदवार थे. सामने कोई पारंपरिक विपक्षी चेहरा नहीं था. प्रशांत किशोर खुद मैदान में थे और उन्होंने अपनी पूरी राजनीतिक साख इस चुनाव पर लगा दी थी. इसलिए मुकाबला सिर्फ बीजेपी बनाम जन सुराज नहीं था. यह प्रशांत किशोर की विश्वसनीयता की भी परीक्षा थी. बीजेपी के लिए यह नतीजा आईना है. पार्टी को देखना होगा कि कहीं स्थानीय संगठन ढीला तो नहीं पड़ा, कार्यकर्ताओं की पकड़ कमजोर तो नहीं हुई और क्या मतदाताओं से सीधा संवाद पहले जैसा बना रहा. बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन रहा है. अगर उसी में कमी दिखे तो उसे नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है.
यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उपचुनाव अक्सर अलग तरह से वोट कराते हैं. स्थानीय नाराजगी, उम्मीदवार की छवि और उस समय का माहौल कई बार बड़े राजनीतिक समीकरणों पर भारी पड़ जाता है. विधानसभा चुनाव की तस्वीर आमतौर पर अलग होती है. एक और बात इस नतीजे से साफ दिखी. जन सुराज अब सिर्फ चर्चा की पार्टी नहीं है. अगर उसका विस्तार जारी रहता है तो चुनौती सिर्फ बीजेपी के सामने नहीं होगी. राष्ट्रीय जनता दल को भी अपने पारंपरिक वोट बैंक की चिंता करनी पड़ेगी. बिहार की राजनीति अब धीरे धीरे त्रिकोणीय मुकाबले की तरफ बढ़ती दिख रही है.
बिहार का इतिहास यही कहता है कि यहां का मतदाता आखिरी वक्त पर ऐसा फैसला भी कर देता है जिसकी भविष्यवाणी बड़े बड़े राजनीतिक जानकार नहीं कर पाते. शायद यही इस राज्य की सबसे अलग पहचान है. इसलिए बांकीपुर का संदेश सिर्फ इतना नहीं कि बीजेपी हार गई. संदेश यह है कि कोई भी गढ़ हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं होता. उसे लगातार मेहनत से बचाना पड़ता है. शायद इसी वजह से 'महारानी' का वह संवाद आज भी बिल्कुल फिट बैठता है, "जब आपको लगता है कि आप बिहार को समझ गए हैं... बिहार आपको झटका देता है."
बीजेपी अगर इस नतीजे को केवल एक हार मानकर आगे बढ़ गई तो सीख छूट जाएगी. लेकिन अगर इसे संगठन को और मजबूत करने, नए मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने और स्थानीय नेतृत्व को सक्रिय करने का मौका मानती है, तो बांकीपुर भविष्य में उसके लिए टर्निंग प्वाइंट भी बन सकता है.
