बाल यौन उत्पीड़न के मामले दर्ज हुए 734, पर महज 14 मामलों का ही हुआ निबटारा
राज्य में इस वर्ष जनवरी से जून तक का आंकड़ा
पॉक्सो के लंबित मामलों की संख्या 678 है, इन मामलों का स्पीडी ट्रायल चलाने का है प्रावधान
पटना : राज्य में बच्चों के खिलाफ अपराध और अत्याचार से जुड़े मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. ऐसे मामलों की संख्या लगातार बढ़ने के बाद भी इन मामलों की सुनवाई समय पर नहीं हो पाती और इन अपराधों के खिलाफ न्याय मिलने में भी देरी हो रही है.
सामान्य अपराध की तरह ही बाल अपराध के मामले भी लंबे समय से सैकड़ों की संख्या में कोर्ट में लंबित पड़े हुए हैं. इनके निबटारे की दर काफी धीमी है.
सिर्फ इस वर्ष के आंकड़ों की बात करें, तो चाइल्ड रेप के मामले जनवरी से जून तक राज्य भर में 734 दर्ज हुए, लेकिन महज 14 का ही निबटारा हो पाया है. यानी इनके निबटारे की दर महज दो फीसदी है. इसी तरह पॉक्सो से जुड़े कुल मामलों की बात करें, तो राज्य में 678 मामले लंबित पड़े हुए हैं. इसमें कुछ मामले तीन साल से भी पुराने हैं.
जबकि, बाल अपराध से जुड़े मामलों में यह प्रावधान है कि इन मामलों का स्पीडी ट्रायल कराकर अधिकतम तीन महीने में निबटारा करना है. परंतु कुछ एक मामले में तो मामला लंबे तक चलने से नाबालिग की उम्र बढ़कर वह बालिग में तब्दील हो जाता है. फिर भी उसे न्याय नहीं मिलता.
जज के पास काम ज्यादा होने से केसों की सुनवाई में लगता है समय
कानूनविदों के अनुसार बाल अपराध के मामले लंबित होने के कई कारण हैं. चाइल्ड कोर्ट का गठन तो कर दिया गया है, लेकिन इनमें तैनात जज के पास एक या कई अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया जाता है. इस वजह से काम अत्यधिक होने से केसों की सुनवाई में देरी होती है.
सबसे अहम कारणों में गवाहों को समय पर प्रस्तुत नहीं करना, आरोपितों का समय पर गिरफ्तारी नहीं होना, केस डायरी समय पर नहीं जमा करना, बेवजह का समय बढ़ाते जाना शामिल हैं. चाइल्ड राइट कानून के जानकार एडवोकेट केडी मिश्रा का इस मामले में कहना है कि बाल अपराध के मामले में देरी होने से पीड़ित बच्चों की मनस्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ता है.
खासकर चाइल्ड रेप के मामले में सजा मिलने में देरी होने का कई स्तर पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ता है. बच्चों से जुड़े मामलों का निबटारा तेजी से होना ही चाहिए. निबटारे में जितनी देरी होगी इसका प्रतिकूल असर समाज से लेकर कई स्तर पर पड़ेगा.
