दीपक कुमार मिश्रा
पटना : भाजपा और जदयू के बीच सीट शेयरिंग हो जाने के बाद अब भाजपा को दो मोर्चे पर जूझना है. एक तो टिकट में अपनों से जूझना होगा व दूसरे मोर्चे पर लोस चुनाव में बेहतर प्रदर्शन बनाये रखना भी चुनौती होगी. 2014 में भाजपा 30 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसे 22 सीटों पर सफलता मिली थी. इस बार पार्टी 16 या 17 सीटों पर लड़ेगी. कई मौजूदा सांसद भी बेटिकट होंगे.
साथ ही टिकट की दौड़ में शामिल नेताओं की पत्ता भी गोल होगा. भाजपा के कुछ सांसद इधर-उधर संपर्क साधने में लग गये हैं. पिछले लोस चुनाव में प्रदर्शन के हिसाब से देखा जाये, तो बिहार से बेहतर अन्य राज्यों में प्रदर्शन रहा था. दिल्ली की सात में से सात और राजस्थान की 25 में से 25 सीटों पर भाजपा विजयी हुई थी.
यूपी के 80 सीटों में 72 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. झारखंड की 14 में से 12 और मध्यप्रदेश की 33 में 27 सीटें भाजपा के खाते में गयी थी. बिहार में 30 में से 22 सीटें मिली थी. प्रदर्शन के लिहाज से देखा जाये तो भाजपा बिहार की तुलना में अन्य राज्यों से कमतर ही रही. बिहार में जदयू और भाजपा बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
ऐसे में भाजपा को पांच से छह सीटें छोड़नी होगी. अभी यह तय नहीं हुआ है कि कौन- कौन सी सीट पर कौन दल चुनाव लड़ेगा. इसको लेकर सस्पेंस है लेकिन कुछ सीटों के नामों की चर्चा है. भाजपा के सामने मुश्किल होगी कि टिकट कटने के बाद या टिकट की आस लगाये बैठे नेताओं को कैसे मनायेगी.
अगले सप्ताह सीटों का भी हो सकता है एलान
अगले सप्ताह भाजपा और जदयू सहित एनडीए में शामिल अन्य दलों में यह तय हो जायेगा कि कौन सी सीट किस दल के खाते में जायेगी. भाजपा के मौजूदा सांसदों में इस बात को लेकर ऊहापोह की स्थिति बन गयी है कि पता नहीं कहीं उनकी सीट तो जदयू के कोटे में न चली जाये. चर्चाओं और कयासों पर यकीन किया जाये तो भाजपा दरभंगा, बेगूसराय, आरा किशनगंज, बांका सीट छोड़ सकती है. भाजपा को मुंगेर सीट मिल सकता है. पूर्णिया सीट जो अभी जदयू के पास है, वह भाजपा को मिल सकती है.
भाजपा-जदयू के बीच बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद भाजपा के कई सांसद
दूसरे दलों में अपने संपर्कों को टटोलने लगे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की शनिवार को अरुण जेटली से भी मुलाकात हुई थी. भाजपा और जदयू के प्रमुख नेता शनिवार को दिल्ली में ही थे.
