पटना : सूचना के अधिकार कानून अंतर्गत जानकारी नहीं देने पर राज्य सूचना आयोग ने पटना विवि पर 50 हजार रुपये का जुर्माना ठोका है. 50 हजार रुपये की ये राशि चार माह के अंतर शिकायतकर्ता को देनी है.
सूचना आयोग ने सूचना के अधिकार का उल्लंघन करने पर पटना विवि को कड़ी फटकार भी लगायी है. इस मामले में विवि की तरफ से दिये गये सभी दलील को खारिज कर दिया गया था. पांच साल के बाद आये फैसले पर इसकी लड़ाई लड़ रहे सामाजिक कार्यकर्ता मधुसूदन कुमार सिंह ने कहा कि बिहार की सबसे बेहतर यूनिवर्सिटी होने के बाद भी इसकी स्थिति हास्यास्पद है.
विवि प्रशासन सूचना के अधिकार की धज्जियां उड़ाने में पीछे नहीं है. उन्होंने कहा कि आरटीआई से मांगी गयी कॉपियां आवेदक को उपलब्ध करायी नहीं और उन्हीं कॉपियों को पीयू प्रशासन ने चार साल बाद हुई नीलामी में बेच दिया. जबकि इन्हीं कॉपियों की मांग को लेकर आरटीआई लगाने वाली छात्रा तीन साल तक यूनिवर्सिटी के चक्कर लगाती रही. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक सूचना के अधिकार के तहत प्रथम अपील को भी पीयू ने नजरअंदाज कर दिया था.
2013 को आरटीआई के तहत मांगी थी बीएमसी पार्ट टू के छठे पेपर की कॉपी : पीयू की स्नातक की छात्रा रही अश्मनी ने 24 जुलाई 2013 को सूचना के अधिकार के तहत बीएमसी पार्ट टू के छठे पेपर के आंसर की कॉपी मांगी थी, लेकिन विवि प्रशासन ने कॉपियां उपलब्ध नहीं करायी. तब छात्रा प्रथम अपील में चली गयी.
इसके बावजूद उसे कॉपी नहीं दी गयी. प्रथम अपील के चार माह बीतने के बाद छात्रा ने पीयू के खिलाफ राज्य सूचना आयोग में शिकायत की.
पीयू को इस सबंध में आयोग ने पत्र भेजा था. जवाब में पीयू के लोक सूचना पदाधिकारी ने 26 मई 2018 को प्रतिवेदन दिया कि आवेदक ने जिस कॉपी की छायाप्रति मांगी है, वह 23 सितंबर 2017 को सार्वजनिक नीलामी से बेच दी गयी है. मधुसूदन कुमार सिंह ने कहा कि मेरी बेटी गोल्ड मेडलिस्ट होती, लेकिन पीयू प्रशासन ने जानबूझ कर कॉपी उपलब्ध नहीं करवायी.
कॉपी को चिह्नित कर हटाने की बजाय उसे भी बेच दिया : इस मामले के वकील सचिन ठाकुर ने कहा कि सुनवाई में क्षतिपूर्ति की बात भी कही गयी है. इसके साथ छात्रा के मार्क्स बढ़ाने की बात भी की गयी थी. वैसे इस मामले में आयोग ने शुरू से ही कड़ा रुख अपनाया था. आयोग ने इस संबंध में 25 सितंबर को फैसला सुनाया.
इसमें पीयू को आदेश जारी किया है कि वह अश्मनी को चार माह के अंदर 50 हजार का भुगतान करे. सचिन ठाकुर ने कहा कि ओम प्रकाश ने पहले ही कहा था कि जब कॉपी मांगी गयी थी, तो उस कॉपी को चिह्नित कर हटा दिया जाना चाहिए था, लेकिन उसे भी बेच दिया गया. यह तो अधिकार का हनन है. हो सकता है कि छात्रा गोल्ड मेडलिस्ट हो जाती. उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी का यह इस तरह का पहला केस है जिसमें फैसला हुआ है और पीयू पर जुर्माना भी ठोका गया है.
