सुस्त रफ्तार से चल रहा काम
पटना : 2012 में प्रदेश में हाई सेक्यूरिटी नंबर प्लेट (एचएसएनपी ) लगाने का काम शुरू हुआ. पिछले छह वर्षों में पटना में बमुश्किल दो लाख वाहनों में हाई सेक्यूरिटी नंबर प्लेट लग सका है जबकि पटना जिला परिवहन कार्यालय में 13 लाख से अधिक वाहन पंजीकृत है.
आरंभ में हाई सेक्यूरिटी नंबर प्लेट लगाने की धीमी गति की वजह एक ही पंजीकरण केंद्र होना माना गया और इसकी गति को तेज करने के लिए 29 जून 2018 से पटना में छह पंजीकरण केंद्र खोले गये. इसके बावजूद हाई सेक्यूरिटी नंबर प्लेट लगाने की गति में अपेक्षित इजाफा नहीं हुआ है और एक दिन में औसतन 864 वाहनों में ही नंबर प्लेट लग पा रहा है. यदि यही गति रही तो अगले तीन वर्षों में भी जिले के सभी वाहनों में हाई सेक्यूरिटी नंबर प्लेट नहीं लग पायेगा.
महीने में 25 हजार वाहनों में ही लग पा रहा एचएसएनपी : वर्ष 2012 से जून 2018 तक छह वर्ष में लगभग सवा लाख ही एचएसएनपी लग पाया. 29 जून से छह पंजीकरण केंद्र शुरू होने के बाद भी महीने में केवल 25 हजार एचएसएनपी लगे रहे हैं और पिछले तीन महीने में केवल 76 हजार एचएसएनपी ही लग पाये हैं.
रेडियम मिक्स स्टिकर का कैमरे ले पाते बेहतर फोटो
हाई सेक्यूरिटी नंबर प्लेट परंपरागत नंबर प्लेट से कई तरह से अलग होता है. सामान्य नंबरों की तुलना में नंबर की लिखी जगह पर अधिक उभार होने से यह ट्रैफिक पुलिस के द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे स्टेटिक और पैन टिल्ट जूम कैमरे की पकड़ में भी परंपरागत कैमरे की तुलना में अधिक आसानी से आ जाता है.
रात में सामान्यत: 100 फीट तक की दूरी के नंबर प्लेट को ही कैमरे पकड़ पाते हैं जबकि हाई सेक्यूरिटी नंबर प्लेट 150 फीट की दूरी तक पकड़े जाते हैं. रेडियम मिक्स स्टीकर लगे होने के कारण एचएसएनपी पीछे वाले वाहनों के हेडलाइट और स्ट्रीट लाइट के प्रकाश को कम परावर्तित करते हैं. इसकी वजह से कैमरे भी इनका अधिक बेहतर फोटो खींच पाते हैं.
लेजर कोड में अंकित होता है पूरा ब्योरा : एचएसएनपी के बगल में एक लेजर कोड अंकित होता है, जिसमें वाहन का इंजन नंबर, चेसिस नंबर और वाहन मालिक का पूरा ब्यौरा लिखा होता है. लेजर गन इनको बिना मैनुअल सपोर्ट के अपने आप पढ़ लेता है.
