PATNA EXCLUSIVE : गुलजारबाग में 108 फीट ऊंची लगेगी भगवान महावीर की प्रतिमा

PATNA EXCLUSIVE : गुलजारबाग में बनने वाली भगवान महावीर की 108 फीट ऊंची यह प्रतिमा पूरे बिहार ही नहीं, देश के प्रमुख धार्मिक आकर्षणों में शामिल होने की क्षमता रखती है गुलजारबाग स्थित कमलदह जी क्षेत्र में इतिहास, आस्था और आधुनिकता का यह अद्भुत संगम होगा.

PATNA EXCLUSIVE : बिहार की पावन धरती सदियों से धर्म, अध्यात्म और संस्कृति की जननी रही है. इसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गुलजारबाग स्थित कमलदह जी क्षेत्र में एक भव्य और ऐतिहासिक जैन तीर्थ का निर्माण होने जा रहा है. यह वही पुण्यभूमि है जहां जैन धर्म के महान आचार्य श्री स्थूलीभद्र स्वामी की साधना स्थली और श्रेष्ठी सुदर्शन स्वामी का अलौकिक स्थान स्थित है. जैन श्वेतांबर समाज के लिए यह स्थान किसी स्वर्ग से कम नहीं माना जाता. संपूर्ण जैन श्वेतांबर समाज के सहयोग से यह भावनात्मक और ऐतिहासिक तीर्थ आकार ले रहा है. माना जा रहा है कि निर्माण पूरा होने के बाद यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बनेगा और देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचेंगे.जैन धर्म में श्रेष्ठी सुदर्शन की कथा सदाचार, सत्य और चरित्र की प्रेरणा देने वाली मानी जाती है. कहा जाता है कि जब उन्हें सूली पर चढ़ाया गया, तब उन्होंने नवकार महामंत्र का स्मरण किया और सूली सिंहासन में परिवर्तित हो गई. यह घटना आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था और चमत्कार का प्रतीक बनी हुई है.

100000 वर्गफीट में बनेगा संगमरमर का अद्भुत तीर्थ

इस ऐतिहासिक धरोहर के जीर्णोद्धार और भव्य निर्माण का जिम्मा मणि लक्ष्मी तीर्थ के दिनेश भाई शाह ने लिया है. श्री स्थूलीभद्र श्रेष्ठी सुदर्शन जैन श्वेतांबर मणि लक्ष्मी तीर्थ नाम से बनने वाला यह विशाल परिसर लगभग 100000 वर्गफीट क्षेत्र में फैला होगा. सफेद संगमरमर से निर्मित यह मंदिर अपनी अद्भुत नक्काशी और भव्य स्थापत्य कला के कारण देश ही नहीं बल्कि विदेशों के श्रद्धालुओं को भी आकर्षित करेगा. मंदिर की वास्तुकला ऐसी होगी कि श्रद्धालु यहां पहुंचते ही आध्यात्मिक शांति का अनुभव करेंगे.

प्रतिमा की ऊंचाई होगी 108 फीट

 इस तीर्थ की सबसे बड़ी विशेषता होगी भगवान महावीर स्वामी की 72 फीट ऊंची प्रतिमा. भगवान महावीर की आयु 72 वर्ष होने के कारण प्रतिमा की ऊंचाई भी 72 फीट निर्धारित की गई है. यह प्रतिमा 36 फीट ऊंचे कमल पर स्थापित होगी, जिससे इसकी कुल ऊंचाई 108 फीट हो जाएगी. यह प्रतिमा पूरे बिहार ही नहीं, देश के प्रमुख धार्मिक आकर्षणों में शामिल होने की क्षमता रखती है.

धर्मशाला, भोजनशाला और कमल सरोवर बनेंगे आकर्षण

तीर्थ परिसर को केवल पूजा स्थल तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसे संपूर्ण आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा. बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सर्वसुविधायुक्त धर्मशाला का निर्माण होगा, जहां आधुनिक सुविधाओं के साथ ठहरने की व्यवस्था रहेगी.इसके साथ ही विशाल भोजनशाला, साधु-साध्वियों के उपाश्रय और श्रद्धालुओं के लिए ध्यान एवं साधना केंद्र भी बनाए जाएंगे. चूंकि यह भूमि आचार्य स्थूलीभद्र स्वामी की साधना स्थली रही है, इसलिए यहां एक भव्य कमल सरोवर का निर्माण भी प्रस्तावित है. हरियाली और पेड़-पौधों से घिरा यह सरोवर आने वाले श्रद्धालुओं को अद्भुत मानसिक शांति प्रदान करेगा.

चित्रशाला भी जायेगी बनाई

परिसर में जैन जगत, तीर्थंकरों, आचार्य स्थूलीभद्र स्वामी और श्रेष्ठी सुदर्शन स्वामी के जीवन पर आधारित चित्रशाला भी बनाई जाएगी. यहां आने वाले लोग केवल दर्शन ही नहीं, बल्कि जैन इतिहास और संस्कृति को भी करीब से जान सकेंगे.

पटना ग्रुप ऑफ जैन श्वेतांबर टेंपल्स कमिटी निभा रही बड़ी भूमिका

करीब 5.04 एकड़ क्षेत्रफल वाली इस ऐतिहासिक भूमि की देखरेख वर्षों से पटना ग्रुप ऑफ जैन श्वेतांबर टेंपल्स कमिटी द्वारा की जा रही है. कला एवं संस्कृति विभाग तथा पुरातत्व विभाग में भी इस भूमि का उल्लेख दर्ज है.

तीर्थ का इतिहास

आचार्य श्री स्थूलिभद्र स्वामी जैन धर्म के एक महान आचार्य, विद्वान और तपस्वी मुनि थे. उन्होंने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार तथा आगम ग्रंथों के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया. उनका जीवन त्याग, संयम और आत्मसंयम का अद्भुत उदाहरण माना जाता है. स्थूलीभद्र स्वामी का जन्म लगभग 297 ईसा पूर्व में हुआ था और वे जैन धर्म के श्वेतांबर परंपरा के प्रमुख आचार्यों में गिने जाते हैं.

आचार्य स्थूलिभद्र का जन्म मगध क्षेत्र में हुआ था. उनके पिता शकटाल (शक्ताल) राजा धनानंद के मंत्री थे. बचपन से ही स्थूलिभद्र अत्यंत बुद्धिमान, सुन्दर और प्रतिभाशाली थे. युवावस्था में वे पाटलिपुत्र की प्रसिद्ध नर्तकी रूपकोशा के प्रेम में पड़ गए और सांसारिक जीवन में लिप्त हो गए.

वैराग्य और दीक्षा

कुछ समय बाद उन्हें यह अनुभव हुआ कि सांसारिक सुख क्षणिक होते हैं और जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मकल्याण है. तब उन्होंने सब कुछ त्याग कर जैन साधु बनने का निश्चय किया. वे जैन आचार्य संभूतविजय के शिष्य बने और कठोर तप, अध्ययन तथा साधना में लग गए.

तप और आत्मसंयम की परीक्षा

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार वर्षावास (चातुर्मास) के समय उन्होंने उसी नर्तकी रूपकोशा के घर में रहकर तपस्या की. रूपकोशा ने उन्हें फिर से सांसारिक जीवन की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया, परंतु स्थूलिभद्र स्वामी अपने संयम से विचलित नहीं हुए. अंततः उनकी आध्यात्मिक शक्ति से प्रभावित होकर रूपकोशा ने भी जैन धर्म की श्राविका व्रत धारण कर लिया. एक समृद्ध और प्रतिष्ठित व्यापारी थे. उनके पास धन-दौलत, प्रतिष्ठा और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी. लेकिन इतने वैभव के बावजूद उनका जीवन अत्यंत सादा और धार्मिक था. वे नियमित रूप से जैन धर्म के सिद्धांतों अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और संयम का पालन करते थे.

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By SUBODH KUMAR NANDAN

SUBODH KUMAR NANDAN is a contributor at Prabhat Khabar.

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