गंगा के बीच जिंदगी का सफर

गंगा के बीच जिंदगी का सफर: नाव पर सवार सैकड़ों लोगों की सुरक्षा भगवान भरोसे, लाइफ जैकेट तक नहीं

गंगा नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है, लेकिन दियारा क्षेत्र के सैकड़ों लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए रोज जान जोखिम में डाल रहे हैं. लाइफ जैकेट जैसी सुरक्षा सुविधाओं के अभाव में यह सफर बेहद खतरनाक बना हुआ है.

Nepal Flood : गंगा का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर है. नदी का बहाव तेज है और लहरों का दबाव भी लगातार बना हुआ है. इसके बावजूद दियारा क्षेत्र के सैकड़ों लोगों का रोजमर्रा का जीवन इसी गंगा के भरोसे चल रहा है. रोजगार, राशन, सब्जी, दवा, पढ़ाई और जरूरी सामान के लिए उन्हें नाव से गंगा पार करनी पड़ती है. सबसे चिंता की बात यह है कि जिस नाव पर एक साथ बड़ी संख्या में लोग सफर करते हैं, वहां यात्रियों की सुरक्षा के लिए लाइफ जैकेट तक उपलब्ध नहीं है.

पेट की मजबूरी के आगे डर भी छोटा

ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें गंगा पार करने में डर लगता है, लेकिन पेट की मजबूरी उन्हें रोज नाव पर बैठने को मजबूर करती है. एक ग्रामीण ने कहा कि डर तो बहुत लगता है, लेकिन काम के लिए आना-जाना जरूरी है. अगर नाव नहीं होगी तो वे रातभर कछार पर ही समय गुजारेंगे. दियारा क्षेत्र में रोजगार और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए गंगा के इस पार आना उनकी मजबूरी है.

एक नाव पर 40 से लेकर 100 से ज्यादा लोग

ग्रामीणों के अनुसार अलग-अलग नावों पर 40 से 50 और कई बड़ी नावों पर 100 से 125 तक लोग सवार हो जाते हैं. गंगा में तेज बहाव के बीच नाव के डगमगाने के बावजूद यात्रियों के पास सुरक्षा के पर्याप्त साधन नहीं हैं. ग्रामीणों से जब पूछा गया कि अगर नाव हादसे का शिकार हो जाये तो जिम्मेदार कौन होगा, तो उनका जवाब था- "भगवान और गंगा माई."

लाइफ जैकेट के सवाल पर सामने आया दर्द

ग्रामीणों से जब लाइफ जैकेट के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि गरीब परिवार अपने बच्चों का पेट पालने और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने में ही मुश्किल से कमाई खर्च कर पाते हैं. ऐसे में लाइफ जैकेट खरीदना उनके लिए संभव नहीं है. उनका कहना है कि अगर सरकार नाव से आने-जाने वाले लोगों के लिए लाइफ जैकेट उपलब्ध करा दे तो कम से कम किसी हादसे की स्थिति में बचाव की संभावना बढ़ सकती है.

दवा से लेकर राशन तक के लिए नाव ही सहारा

दियारा क्षेत्र के लोगों के लिए नाव केवल आने-जाने का साधन नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है. घर का राशन, आटा, तेल, सब्जी, दवा और बच्चों की जरूरत का सामान खरीदने के लिए उन्हें गंगा के इस पार आना पड़ता है. बच्चों को स्कूल भेजने के लिए भी कई परिवारों को नाव पर निर्भर रहना पड़ता है.

एक ग्रामीण ने बताया कि यदि किसी व्यक्ति की तबीयत रात में अचानक खराब हो जाये या किसी महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो जाये तो उसे नाव से ही इस पार लाना पड़ता है. ऐसे समय में तेज बहाव और रात का सफर खतरे को और बढ़ा देता है.

60 साल से नाव ही बनी जिंदगी का सहारा

ग्रामीणों का कहना है कि कई परिवार दशकों से इसी तरह नाव के सहारे गंगा पार कर रहे हैं. एक बुजुर्ग ने बताया कि करीब 60 साल की उम्र में भी उनके सामने हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया है. पहले भी नाव से आना-जाना पड़ता था और आज भी वही स्थिति बनी हुई है.

ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के समय नेता दियारा क्षेत्र तक पहुंचते हैं और विकास के वादे करते हैं, लेकिन चुनाव के बाद उनकी समस्याओं को देखने के लिए कोई नियमित रूप से नहीं आता. हालांकि, राजनीतिक दलों और नेताओं को लेकर ग्रामीणों के बयान उनके व्यक्तिगत अनुभव और आरोप हैं.

गंगा के तेज बहाव में बच्चों का भी सफर

इस सफर में सिर्फ बड़े ही नहीं, बच्चे भी शामिल हैं. ग्रामीणों के साथ बच्चे भी नाव से गंगा पार करते हैं. बच्चों की पढ़ाई, घर का सामान और परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए यह जोखिम उठाना पड़ता है. ग्रामीणों का कहना है कि डर सभी को लगता है, लेकिन अगर गंगा पार नहीं करेंगे तो काम कैसे चलेगा.

हादसे के बाद मुआवजा नहीं, पहले सुरक्षा की जरूरत

ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान ग्रामीणों की सबसे बड़ी मांग सुरक्षा को लेकर सामने आयी. उनका कहना है कि किसी हादसे के बाद मुआवजे की घोषणा करने से बेहतर है कि पहले ही सुरक्षा के इंतजाम किये जायें. नियमित नावों पर लाइफ जैकेट उपलब्ध हों, क्षमता से अधिक यात्रियों को सवार न किया जाये और नदी के तेज बहाव के दौरान विशेष निगरानी हो तो हादसे का खतरा कम किया जा सकता है.

सवाल यही- मजबूरी का यह सफर कब होगा सुरक्षित?

दियारा के लोगों के लिए गंगा पार करना पर्यटन या मनोरंजन नहीं, बल्कि जिंदगी की जरूरत है. शहरों में लोग नाव की सवारी शौक से करते हैं, लेकिन यहां लोगों के लिए नाव रोजी-रोटी तक पहुंचने का जरिया है. एक तरफ गंगा उफान पर है और दूसरी तरफ इसी तेज बहाव के बीच ग्रामीणों का रोज का सफर जारी है.

तस्वीरें सवाल खड़ा करती हैं कि जब इन लोगों का नाव से सफर उनकी मजबूरी है, तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? क्या हादसे के बाद मुआवजा देने से पहले इन यात्रियों को लाइफ जैकेट और सुरक्षित नाव उपलब्ध नहीं करायी जा सकती? दियारा के लोगों की यह आवाज अब प्रशासन और सरकार तक पहुंचने का इंतजार कर रही है.

Also Read : BPSC TRE-4: आंदोलन स्थगित, संघर्ष नहीं, दिलीप कुमार ने किया फिर आंदोलन का ऐलान

प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By विवेक सिंह

विवेक सिंह की डिजिटल मीडिया और जनसरोकारों से जुड़े विषयों में विशेष रुचि रही है. वे बिहार के मिथिला क्षेत्र के निवासी हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 2 वर्षों से सक्रिय रूप से योगदान दे रहे हैं.

उन्होंने मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की पढ़ाई की है. शिक्षा के दौरान उन्होंने रिपोर्टिंग, समाचार लेखन, डिजिटल मीडिया, जनसंचार, फोटो जर्नलिज्म, मोबाइल जर्नलिज्म (MOJO) और मीडिया रिसर्च की गहन समझ विकसित की है. अध्ययन के दौरान उन्होंने इंटर्नशिप भी की, जहां उन्हें न्यूजरूम की कार्यप्रणाली, टीवी समाचार निर्माण, स्क्रिप्ट लेखन, विजुअल चयन, फील्ड रिपोर्टिग और प्रसारण प्रक्रिया को नजदीक से समझने का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ.

पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से ग्राउंड रिपोर्टिंग, जनमत संग्रह (Public Opinion), सामाजिक मुद्दों की कवरेज और स्थानीय समाचारों के संकलन का व्यापक अनुभव प्राप्त किया. उन्होंने विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और जनहित से जुड़े विषयों पर जमीनी स्तर से रिपोर्टिंग करते हुए आम लोगों की आवाज को प्रमुखता से सामने लाने का कार्य किया है.

इसके साथ ही वे NGO से जुड़कर सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं. स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता, युवा सशक्तिकरण, धार्मिक और जनकल्याण से जुड़े अभियानों में उनकी विशेष भागीदारी रही है. समाज के विभिन्न वर्गों के बीच जागरूकता फैलाने और सकारात्मक बदलाव लाने के प्रयासों में वे निरंतर योगदान देते रहे हैं.

वर्तमान में विवेक सिंह राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, रोजगार, खेल, अपराध, रियल-टाइम समाचारों, सामाजिक सरोकारों और समसामयिक विषयों से जुड़ी खबरों पर लेखन करते हैं. डिजिटल पत्रकारिता के साथ-साथ उन्हें SEO (Search Engine Optimization), कंटेंट प्लानिंग और ट्रेंड-आधारित समाचार लेखन की अच्छी समझ है. ब्रेकिंग न्यूज की पहचान, त्वरित कवरेज और कम समय में तथ्यपरक समाचार तैयार करना उनकी प्रमुख कार्यक्षमताओं में शामिल है.

विवेक सिंह किसी भी समाचार को प्रकाशित करने से पहले तथ्यों की जांच और सत्यापन को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं. वे विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करने के बाद ही समाचार प्रकाशित करते हैं, जिससे उनकी रिपोर्टिंग और लेखन में सटीकता तथा विश्वसनीयता बनी रहती है. तथ्यपरक, निष्पक्ष और भरोसेमंद पत्रकारिता में विश्वास रखने वाले विवेक सिंह पाठकों तक गुणवत्तापूर्ण और विश्वसनीय जानकारी पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >