नवादा: अलनीनो के प्रभाव से रूठा मानसून, कृषि वैज्ञानिकों ने दी कम पानी वाली फसलें और धान की सीधी बुवाई करने की सलाह

प्रशांत महासागर में अलनीनो के बढ़ते प्रभाव से नवादा का मौसम बदला है, जिससे मानसून पर असर पड़ा है। कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों को बदलती परिस्थितियों के अनुसार खेती की पद्धतियां बदलने की सलाह दी है।

Nawada News: प्रशांत महासागर में हो रहे भौगोलिक बदलावों का सीधा असर अब बिहार के नवादा जिले के मौसम और पारम्परिक किसानी पर दिखने लगा है. कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), नवादा के विषय वस्तु विशेषज्ञ रविकांत चौबे ने मौसम के लगातार बदलते मिजाज पर गहरी चिंता जताते हुए स्थानीय किसानों के लिए एक बेहद जरूरी कृषि एडवायजरी जारी की है. उन्होंने किसानों से अपील की है कि वे समय के अनुसार अपनी कृषि पद्धतियों में बदलाव लाएं.

क्यों रूठा मानसून? समझें अलनीनो का गणित

कृषि वैज्ञानिक रविकांत चौबे ने इसकी तकनीकी वजह बताते हुए कहा कि प्रशांत महासागर के मध्य एवं पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान इन दिनों असामान्य रूप से गर्म हो रहा है, जिसे मौसम विज्ञान की भाषा में 'अलनीनो' कहा जाता है. इसी अलनीनो के प्रतिकूल प्रभाव के कारण नवादा जिले में मौसम का तापमान लगातार बढ़ रहा है और सामान्य वर्षा का पैटर्न पूरी तरह बदल गया है. नतीजा यह है कि जो मानसूनी बारिश जून और जुलाई के महीनों में नियमित रूप से होनी चाहिए थी, वह इस बार नहीं के बराबर हुई है.

किसानों के लिए संकटकाल में 'प्लान-बी' (वैकल्पिक योजना)

सूखे जैसे गंभीर हालात से निपटने और अन्नदाताओं को आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र ने एक मजबूत वैकल्पिक कृषि योजना तैयार की है. वैज्ञानिकों ने किसानों को पारंपरिक खेती के ढर्रे को छोड़कर आधुनिक 'स्मार्ट एग्रीकल्चर' अपनाने की सलाह दी है:

  • कम अवधि वाली धान की किस्में: किसान अब लंबी अवधि वाले पारंपरिक धान के बजाय कम दिनों में तैयार होने वाली उन्नत प्रजातियों को प्राथमिकता दें.
  • प्रमुख प्रजातियां: इसके लिए 'प्रभात', 'शुष्क सम्राट' और 'सहभागी' जैसी प्रजातियों का चयन करें. ये फसलें मात्र 95 से 110 दिनों के भीतर पूरी तरह पककर तैयार हो जाती हैं, जिससे कम पानी में भी उपज मिल जाती है.

धान की सीधी बुवाई तकनीक अपनाने पर जोर

जिले में पानी की भारी कमी को देखते हुए कृषि वैज्ञानिक ने धान की पारंपरिक कीचड़ वाली रोपनी (कदो) करने के बजाय आधुनिक मशीनों के माध्यम से सीधे खेतों में धान की बुवाई (डीएसआर) करने की सलाह दी है. इसके लिए किसान जीरो टिलेज मशीन, हैप्पी सीडर मशीन या ड्रम सीडर मशीन का उपयोग कर सकते हैं. इस आधुनिक तकनीक से खेती की लागत और सिंचाई के पानी दोनों की भारी बचत होती है.

धान के बदले वैकल्पिक फसलों का रुख करें

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कहा कि जिन खेतों में पानी की अत्यंत कमी है और ट्यूबवेल की व्यवस्था नहीं है, वहां जबरन धान लगाने के बदले कम पानी में आसानी से होने वाली अन्य खरीफ फसलों की बुवाई करें. इसके लिए किसानों के पास कई बेहतरीन विकल्प मौजूद हैं:

  • बेहतरीन विकल्प: किसान अपने खेतों में अरहर, मक्का, मड़वा (रागी), उड़द और सोयाबीन जैसी दलहन व मोटे अनाजों की फसलें लगाकर अपने संभावित नुकसान की शत-प्रतिशत भरपाई आसानी से कर सकते हैं.


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लेखक के बारे में

Author: Dashrath mistri

Published by: Vikash Jha

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