मुजफ्फरपुर से कुमार दीपू की रिपोर्ट
Muzaffarpur News: उत्तर बिहार का जो इलाका बीते वर्षों तक गर्मी आते ही एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) यानी चमकी बुखार के खौफनाक हॉटस्पॉट के रूप में जाना जाता था, आज स्वास्थ्य प्रबंधन की अनूठी मिसाल बन गया है. कभी मासूमों की जान लेने वाली इस बीमारी पर मुजफ्फरपुर ने मुकम्मल रोक लगा दी है. जिला स्वास्थ्य समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, इस सीजन में एसकेएमसीएच में भर्ती हुए सभी 35 मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने घर लौट चुके हैं. इनमें 20 बच्चे मुजफ्फरपुर के और 15 दूसरे जिलों के थे. इस शत-प्रतिशत रिकवरी रेट के साथ जिले ने लगातार तीसरे साल ‘शून्य मृत्यु दर’ का रिकॉर्ड बनाया है.
विटामिन मिश्रण और गोल्डन ऑवर रणनीति ने बचाई जान
एसकेएमसीएच के शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. गोपाल शंकर सहनी ने बताया कि विशेष विटामिन मिश्रण सीधे बच्चे के सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर काम करता है. यह बीमारी के शुरुआती स्टेज में ही मस्तिष्क की कोशिकाओं को होने वाले नुकसान को रोक देता है. वहीं, एईएस से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण बच्चों का अस्पताल देरी से पहुंचना था. इस बार प्रशासन ने ‘गोल्डन ऑवर’ का ख्याल रखते हुए सुदूर ग्रामीण इलाकों से बच्चों को बिना वक्त गंवाए अस्पताल पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस को सीधे टैग किया, जिसकी मॉनिटरिंग कंट्रोल रूम से की गई.
संध्या चौपाल से बदला जमीनी हकीकत का रुख
संवेदनशील प्रखंडों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर 28 प्रकार की जीवन रक्षक दवाएं पहले से उपलब्ध कराई गईं. प्रशासनिक मुस्तैदी के साथ-साथ इस जंग को जन आंदोलन में बदलने का काम स्वास्थ्य विभाग की ‘संध्या चौपाल’ मुहिम ने किया. इसके तहत आशा कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर माताओं को जागरूक किया कि बच्चों को रात में खाली पेट न सुलाएं, धूप से बचाएं और ओआरएस का घोल दें. सुरक्षा चक्र का नतीजा है कि आज अस्पतालों के बेड खाली हो चुके हैं, फिर भी उमस भरा मौसम खत्म होने तक पूरा तंत्र हाई अलर्ट पर रहेगा.
