"सोशल मीडिया वाले और ब्लॉगर सिर्फ वीडियो बनाते हैं, मिलता कुछ नहीं ", बागमती बांध पर रह रही बेघर महिला का फूटा गुस्सा

मुजफ्फरपुर के कटरा में बाढ़ पीड़ितों का दर्द, प्रशासन और सोशल मीडिया ब्लॉगर्स पर फूटा महिला का गुस्सा। जानिए क्या है पूरी खबर।

मुजफ्फरपुर: बागमती नदी के कटरा पीपा पुल के नजदीक तटबंध (बांध) पर शरण लिए बाढ़ पीड़ितों का गुस्सा और दर्द अब चरम पर पहुंच गया है. भीषण चिलचिलाती धूप और मूसलाधार बरसात के बीच खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर इन पीड़ितों की सुध लेने अभी तक कोई भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी नहीं पहुंचा है. स्थिति इतनी दयनीय है कि पीड़ितों को न तो बांध के नीचे और न ही बांध के उस पार रहने की जगह मिल रही है. वहीं, जब वे बांध पर आसरा ढूंढते हैं, तो प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाने के नाम पर उन्हें वहां से भी खदेड़ दिया जाता है.'सुख हो या दुख, जब रहना यहीं है तो चेहरे पर मुस्कान रखना मजबूरी है'इस भीषण संकट के बीच अपनी व्यथा सुनाते हुए एक स्थानीय पीड़ित महिला ने रोष व्यक्त करते हुए कहा

'सुख हो या दुख, जब रहना यहीं है तो चेहरे पर मुस्कान रखना मजबूरी है'

"कोई भी अधिकारी हमें देखने तक नहीं आता. सब सिर्फ वीडियो बनाकर ले जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर राहत या मदद के नाम पर कुछ भी हासिल नहीं होता. बांध पर जाते हैं तो हटा दिया जाता है. लेकिन इतनी दिक्कतों के बाद भी जीना तो इसी हाल में है, चाहे हंसकर जिएं या रोकर, सुख हो या दुख, जब रहना यहीं है तो चेहरे पर मुस्कान रखना ही मजबूरी है."तमाम दुश्वारियों और दाने-दाने को मोहताज होने के बावजूद इन पीड़ितों के चेहरों पर एक लाचार मुस्कान तैर रही है, जो प्रशासनिक व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है.

हर साल की वही नारकीय स्थिति, मूकदर्शक बनी सरकार

ग्रामीणों का कहना है कि हर साल बाढ़ के समय उन्हें इसी नारकीय स्थिति से गुजरना पड़ता है, लेकिन सरकार केवल मूकदर्शक बनी रहती है. बार-बार आने वाली इस आपदा के स्थायी समाधान के बजाय उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बेघर हो चुके पीड़ितों ने सरकार और जिला प्रशासन से अविलंब सुरक्षित आवास (तंबू/शरण स्थली) और उचित राहत सामग्री मुहैया कराने की पुरजोर मांग की है.


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पिछले 16 वर्षों से प्रोफेशनल फोटोग्राफी और पत्रकारिता के क्षेत्र में माधव सक्रिय हैं. बेहतर फोटोग्राफी के लिए इन्हें कई अवार्ड भी मिले हैं.

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