सक्सेस स्टोरी: मुजफ्फरपुर के प्रत्युष प्रभाकर ने साबित कर दिया कि मंजिल तक पहुंचने के लिए शरीर से ज्यादा मजबूत इरादा जरूरी होता है. स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी टाइप-3 जैसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए पिछले करीब 10 वर्षों से व्हीलचेयर पर निर्भर प्रत्युष ने चौथे प्रयास में बिहार प्रशासनिक सेवा में जगह बनाई है. 1098वीं रैंक हासिल कर उनका चयन वरीय उप समाहर्ता के पद पर हुआ है. फिलहाल वे गया स्थित बिपार्ड में प्रशिक्षण ले रहे हैं.
सात साल की मेहनत के बाद मिली सफलता
प्रत्युष के लिए प्रशासनिक सेवा तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा. करीब सात वर्षों तक उन्होंने लगातार तैयारी की. शुरुआती तीन प्रयासों में सफलता नहीं मिली. 66वीं बीपीएससी में वे इंटरव्यू तक पहुंचे, लेकिन अंतिम मेरिट में महज पांच अंकों से जगह नहीं बना सके. इसके बावजूद उन्होंने तैयारी जारी रखी और चौथे प्रयास में अपना सपना पूरा कर लिया.
बीमारी बढ़ती रही, लेकिन तैयारी नहीं रुकी
प्रत्युष को स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी टाइप-3 है. इसमें समय के साथ मांसपेशियों की ताकत कम होती जाती है. साल 2016 से उन्हें व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ रहा है. रोजमर्रा के कई कामों के लिए उन्हें दूसरों की मदद लेनी पड़ती है. इसके बावजूद उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को पढ़ाई के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया.
उनकी तैयारी मुख्य रूप से सेल्फ स्टडी पर आधारित रही. ज्यादातर समय घर से ही पढ़ाई करते हुए उन्होंने प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की. अब प्रशासनिक अधिकारी के रूप में वे दिव्यांग लोगों के लिए व्यवस्था को और अधिक सुलभ बनाने की इच्छा रखते हैं.
मुजफ्फरपुर से पीएचडी तक की पढ़ाई
प्रत्युष ने अपनी शुरुआती शिक्षा से लेकर पीएचडी तक की पढ़ाई मुजफ्फरपुर में ही पूरी की. उन्होंने सेंट जेवियर्स जूनियर सीनियर स्कूल से 10वीं और 12वीं की पढ़ाई की. इसके बाद एलएस कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक और बीआरए बिहार विश्वविद्यालय से एमए किया. उच्च शिक्षा के दौरान उन्होंने यूजीसी नेट-जेआरएफ भी क्वालीफाई किया. पीएचडी के दौरान यूजीसी फेलोशिप और एसआरएफ के रूप में भी काम किया. मई 2024 में उन्हें बिहार विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री मिली.
पिता हर कदम पर बने बेटे का सहारा
प्रत्युष की सफलता में उनके पिता संजय की भूमिका बेहद अहम रही. स्कूल की पढ़ाई से लेकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी और अब बिपार्ड की ट्रेनिंग तक पिता लगातार उनके साथ खड़े हैं. व्हीलचेयर पर बैठाने-उठाने से लेकर आने-जाने तक वे बेटे की मदद करते हैं.
गया में चल रही ट्रेनिंग के दौरान भी संजय उनके साथ असिस्टेंट के तौर पर रह रहे हैं. बेटे की सफलता पर उन्होंने कहा कि माता-पिता का काम बच्चे को सपोर्ट सिस्टम देना है, असली मेहनत बच्चे को ही करनी होती है. जब उनसे पूछा गया कि क्या वे आगे भी इसी तरह बेटे का साथ देते रहेंगे, तो उन्होंने कहा, “बिल्कुल, जब तक जीवन है तो ये हमारी जवाबदेही है.”
प्रत्युष की कहानी सिर्फ एक प्रतियोगी परीक्षा में सफलता की कहानी नहीं है. यह उस जिद और हौसले की कहानी है, जिसने शारीरिक सीमाओं के बावजूद उन्हें प्रशासनिक सेवा तक पहुंचाया.
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