राष्ट्र निर्माण में आचार्यों की भूमिका महत्वपूर्ण, बालकों में संस्कारों का संवर्धन जरूरी

राष्ट्र निर्माण में आचार्यों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. वर्तमान युग में पारंपरिक शिक्षण पद्धतियों में आवश्यक परिवर्तन लाना समय की मांग है.

मुंगेर. राष्ट्र निर्माण में आचार्यों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. वर्तमान युग में पारंपरिक शिक्षण पद्धतियों में आवश्यक परिवर्तन लाना समय की मांग है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) चाहे जितनी उन्नत क्यों न हो जाए किंतु बालकों में संस्कारों का संवर्धन केवल गुरु ही कर सकते हैं. उक्त विचार आरडी एंड डीजे कॉलेज मुंगेर के प्राचार्य डॉ विजेन्द्र कुमार ने बुधवार को सरस्वती विद्या मंदिर के सभागार में आयोजित त्रिदिवसीय आचार्य कार्यशाला के समापन समारोह को संबोधित करते हुए कही. उन्होंने कहा कि बालकों में कठोर परिश्रम की आदत विकसित करना आवश्यक है. इससे वे जीवन की प्रत्येक चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकें. नई शिक्षा नीति में गुरु परंपरा के महत्व पर विशेष बल दिया गया है, जो विद्यार्थियों के समग्र विकास में सहायक सिद्ध होगी. गुरु की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बालकों में शिक्षा के बीज का रोपण करना है. जड़ जितनी सुदृढ़ होगी, वृक्ष उतना ही फलदाई होगा. विद्यालय के प्रधानाचार्य संजय कुमार सिंह ने वार्षिकोत्सव व अभिभावक संपर्क के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए अभिभावकों के साथ सतत संवाद आवश्यक है. इससे अभिभावकों और आचार्य के बीच समन्वय स्थापित होता है तथा विद्यार्थियों की प्रगति की अद्यतन जानकारी भी मिलती रहती है. कार्यक्रम के अंतर्गत पंचपदी शिक्षण पद्धति के माध्यम से आदर्श शिक्षण का भी प्रदर्शन किया गया. इसमें हिंदी विषय में आचार्य मुकेश कुमार सिन्हा, अंग्रेजी में आचार्या शीला मेहता, संस्कृत में आचार्य चंद्रभूषण राय, गणित में आचार्य प्रियरंजन कुमार सिंह तथा विज्ञान में आचार्या प्रीति कुमारी ने उत्कृष्ट शिक्षण प्रस्तुत किया. मौके पर प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष अमरनाथ केशरी एवं कोषाध्यक्ष इंद्रदेव प्रसाद मुख्य रूप से मौजूद थे.

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By RANA GAURI SHAN

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