पादुका दर्शन स्थित संन्यास पीठ में चल रहे चातुर्मास अनुष्ठान के तहत लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के चौथे दिन शुक्रवार को पूरा यज्ञ परिसर भजन, मंत्रोच्चार और आध्यात्मिक प्रवचन से गूंजता रहा. इस दौरान परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने भक्ति योग के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि भक्ति सिर्फ पूजा-पाठ और प्रार्थना करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसान के जीवन और सोच को बदलने वाली साधना है.
भक्ति से बदलती है इंसान की सोच
स्वामी निरंजनानंद ने कहा कि भक्ति योग इंसान को नकारात्मक सोच से सकारात्मकता, आसक्ति से प्रेम और केवल स्मरण से समर्पण की ओर ले जाता है. आध्यात्मिक शिक्षा को केवल सुनना या पढ़ना ही काफी नहीं है. जब गुरु की बात इंसान के व्यवहार में दिखाई देने लगे, तभी वह सच्ची साधना बनती है.
हर जीव के प्रति प्रेम और सम्मान जरूरी
उन्होंने कहा कि हर जीव के प्रति सम्मान, सेवा, सत्कार और प्रेम का भाव रखना भक्ति का अहम हिस्सा है. जैसे-जैसे इंसान की चेतना का विस्तार होता है, वह संसार के हर जीव में परम तत्व को महसूस करने लगता है. गुरु की सीख को अपने जीवन में उतारना ही भक्ति का असली मतलब है.
गुरु की सीख जीवन को योगमय बनाती है
स्वामी निरंजनानंद ने परम गुरुदेव स्वामी सत्यानंद सरस्वती के गीत ‘गुरुवर सत्यानंद, जीवन बने योग’ की व्याख्या भी की. उन्होंने कहा कि यह गीत केवल गुरु की स्तुति नहीं है, बल्कि जीवन को योग के रास्ते पर चलाने का संदेश देता है. गुरु इंसान के भीतर के अज्ञान, भ्रम और भटकाव को दूर कर सही दिशा दिखाते हैं.
समर्पण का मतलब गुरु की बात मानकर चलना
उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति समर्पण का अर्थ सिर्फ उनके सामने श्रद्धा जताना नहीं है. उनके बताए रास्ते और उनकी शिक्षाओं को जीवन में उतारना ही सच्चा समर्पण है. साधना का असर इंसान के व्यवहार में दिखना चाहिए. जब प्रेम सिर्फ अपने परिवार और करीबी लोगों तक सीमित न रहकर समाज और सभी जीवों तक पहुंचता है, तब सामान्य प्रेम धीरे-धीरे दिव्य अनुभूति का रूप लेने लगता है.
नकारात्मकता छोड़ सकारात्मकता की ओर बढ़ना
भक्ति योग के अलग-अलग आयामों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसकी पहली यात्रा नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर होती है. राग, द्वेष, ईर्ष्या और अहंकार जैसे भाव मन को अशांत करते हैं. साधना और मन की शुद्धता के साथ इन भावों में कमी आती है और सकारात्मक सोच बढ़ती है.
आसक्ति से प्रेम की ओर ले जाता है भक्ति योग
उन्होंने कहा कि भक्ति योग का दूसरा आयाम आसक्ति से प्रेम की ओर बढ़ना है. आसक्ति में बंधन और स्वार्थ हो सकता है, जबकि प्रेम का स्वभाव दूसरों तक फैलना है. दूसरों के सुख-दुख में साथ देना, उनकी मदद करना और स्वार्थ से ऊपर उठना आसक्ति को प्रेम में बदलने का रास्ता है.
स्मरण से समर्पण की होती है यात्रा
स्वामी निरंजनानंद ने भक्ति योग के तीसरे आयाम को स्मरण से समर्पण की यात्रा बताया. सामान्य ममत्व अपने लोगों तक सीमित रहता है, लेकिन यही भाव जब सभी के प्रति प्रेम में बदलता है तो ईश्वर-स्मरण का आधार बन जाता है. दिल से दिल का रिश्ता बनने पर इंसान दूसरों के सुख-दुख को समझने लगता है और उनके साथ जुड़ाव महसूस करता है.
कृष्ण-यशोदा प्रसंग से समझाया व्यापक भाव
भगवान श्रीकृष्ण और माता यशोदा के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बाल कृष्ण के मुख में यशोदा ने पूरे ब्रह्मांड का दर्शन किया था. यह प्रसंग बताता है कि परम सत्ता किसी एक जगह या रूप तक सीमित नहीं है. गुरु की शिक्षा इंसान को इसी व्यापक सोच की ओर ले जाती है.
मंत्र जाप और भजन से गूंजता रहा यज्ञ परिसर
महायज्ञ के चौथे दिन ‘ॐ नारायणाय नमः’ और ‘ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः’ मंत्र का 108-108 बार जाप किया गया. श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से भजन भी गाये. मंत्रोच्चार और भजन-कीर्तन से पूरे दिन यज्ञ परिसर में भक्तिमय माहौल बना रहा. श्रद्धालुओं ने यज्ञ में आहुति देकर भगवान नारायण और मां लक्ष्मी की पूजा की.
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