2015-16 का भी पूरा नहीं हो पाया लक्ष्य
मुंगेर : दूध हमारी जरूरतों में शुमार है. जिसे पूरा करने के लिए जिले में जिला गव्य विकास की स्थापना की गयी. ताकि दूध ही जरूरतों को पूरा करने के साथ ही बेरोजगारी को कुछ हद तक दूर किया जा सके. लेकिन बैंकों के असहयोगात्मक रवैये के कारण श्वेतक्रांति लाने के लक्ष्य को पूरा करने में गव्य विकास पिछड़ रहा है. यदि वर्तमान वित्तीय वर्ष को छोड़ भी दिया जाय तो भी पिछले वित्तीय वर्ष 2015-16 में भी 50 प्रतिशत के लक्ष्य को विभाग पूरा नहीं कर सका.
लक्ष्य से पीछे चल रहा गव्य विकास : दूध उत्पादन झमता बढ़ाने एवं बेरोजगारों को रोजगार दिलाने को लेकर जिला गव्य विकास कार्यालय से कृषकों को गाय पालन के लिए अनुदानित दर पर ऋण मुहैया कराने की व्यवस्था है. वित्तीय वर्ष 2015-16 में विभाग को 205 लोगों को दो गाय व पांच गाय का यूनिट लगाने के लिए लक्ष्य दिया गया था. 285 पशुपालकों ने गोपालन ऋण के लिए आवेदन भी दिया. लेकिन अबतक मात्र उस वित्तीय वर्ष में 54 प्रतिशत लोगों को लाभान्वित किया जा सका है.
जबकि वित्तीय वर्ष 2016-17 के लिए 186 लोगों को गोपालन के लिए ऋण मुहैया कराने का लक्ष्य दिया गया. जिसके लिए दो, पांच, दस एवं बीस गायों की यूनिट लगाने के लिए 268 आवेदन प्राप्त हुए. फरवरी खत्म हो गयी और अबतक मात्र 50 प्रतिशत लोगों को ही लाभान्वित किया जा सका. इस वित्तीय वर्ष में 20 गाय के यूनिट लगाने के लिए 3, 10 गायों के यूनिट के लिए 6 एवं 5 गायों के यूनिट लगाने के लिए 15 तथा शेष लोगों को 2 गायों का यूनिट लगाने के लिए ऋण उपलब्ध कराया गया.
क्या है अनुदान की स्थिति : गोपालन के लिए कई कैटेगरी के लिए अलग-अलग अनुदान की राशि तय की गयी है. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए सरकार द्वार 75 प्रतिशित अनुदान की राशि दी जाती है. जबकि जनरल कोटा के लाभुकों के लिए 50 प्रतिशत अनुदान की राशि तय की गयी है. वित्तीय वर्ष में 2015-16 में सरकार द्वारा मुंगेर जिला गव्य विकास को एक करोड़ 92 लाख एवं 2016-17 के लिए दो करोड़ 15 लाख रुपये अनुदान की राशि उपलब्ध करा दी गयी है.
श्वेतक्रांति में बाधक बना बैंक : जिला गव्य विकास द्वारा गोपालन के लिए कृषकों का काउंसेलिंग कर उनके आवेदन को बैंक भेज दिया जाता है. जहां से बैंक द्वारा उसे गायों की संख्या के आधार पर ऋण उपलब्ध कराया जाना है. ऋण स्वीकृति के बाद विभाग द्वारा उक्त बैंक में अनुदान की राशि भेज दी जाती है. अधिकांश किसान गरीब और कम भूमि वाले होते है जो गोपालन के क्षेत्र में रोजगार की तालाश करते हैं. जब गाय के लिए किसान ऋण के लिए बैंक पहुंचते हैं तो वहां उनके ऋण के बदले मोरगेज के तौर पर जमीन व अन्य चीजों का डिमांड की जाती है. जिसमें वे पिछड़ जाते है और रोजगार के अवसर खो बैठते हैं. अगर बैंक सहयोगात्मक रवैया अपनाते है तो लक्ष्य भी पूरा होगा, दूध का उत्पादन भी बढ़ेगा और रोगगार के अवसर भी पैदा होंगे.
कहते हैं जिला गव्य विकास पदाधिकारी
जिला गव्य विकास पदाधिकारी अशोक कुमार ने बताया कि कार्यालय में कम सुविधा रहने के बावजूद भी हमलोग किसानों के आवेदन पर जांच कर ऋण के लिए बैंक को स्वीकृत आवेदन भेज देते है. अब तक दोनों वित्तीय वर्ष में हमलोगों ने 50 प्रतिशत से ऊपर लक्ष्य को पूरा किया है. लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवेदन को बैंक भेजा गया है.
