Motihari News: पूर्वी चंपारण के युवाओं में इन दिनों मणिपुर की पारंपरिक थांग-टा मार्शल आर्ट तेजी से लोकप्रिय हो रही है. बड़ी संख्या में युवा इस भारतीय युद्धकला से जुड़कर आत्मरक्षा के आधुनिक और पारंपरिक गुर सीख रहे हैं. जिला मुख्यालय मोतिहारी के कचहरी रोड स्थित खेल भवन में नियमित अभ्यास के दौरान खिलाड़ियों का जोश देखने लायक होता है. यहां युवा लाठी और पारंपरिक हथियारों के साथ अपनी फुर्ती, संतुलन और आत्मरक्षा की तकनीकों का अभ्यास कर रहे हैं.
खेल भवन में नियमित हो रहा विशेष अभ्यास
मोतिहारी के खेल भवन में समय-समय पर विशेष प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जा रहे हैं. अभ्यास के दौरान प्रशिक्षक खिलाड़ियों को तेज गति से पैरों का मूवमेंट, एकाग्रता और पारंपरिक लाठी संचालन की बारीकियां सिखाते हैं. प्रशिक्षण में हथियारों के इस्तेमाल के साथ-साथ बिना हथियार के आत्मरक्षा की 'सारित-सारत' तकनीक भी सिखाई जाती है, जिससे खिलाड़ी हर परिस्थिति में खुद की रक्षा करने में सक्षम बन सकें.
आत्मविश्वास और अनुशासन बढ़ाने में मददगार
थांग-टा खेल संघ के जिलाध्यक्ष साजिद रजा और सचिव अशफाक अहमद ने बताया कि यह मार्शल आर्ट सिर्फ आत्मरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि युवाओं में अनुशासन, आत्मविश्वास, मानसिक एकाग्रता और शारीरिक फिटनेस भी विकसित करती है. यही वजह है कि जिले के युवाओं में इस पारंपरिक खेल के प्रति लगातार रुचि बढ़ रही है.
बेहतर सुविधाओं से निखर रही खिलाड़ियों की प्रतिभा
जिला प्रशासन की ओर से खिलाड़ियों को खेल भवन की तीसरी मंजिल पर नियमित अभ्यास के लिए विशेष समय उपलब्ध कराया गया है. बेहतर अभ्यास सुविधाओं का लाभ मिलने से यहां के खिलाड़ी राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भी लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं. उनकी सफलता से प्रेरित होकर हर दिन नए बच्चे और युवा इस मार्शल आर्ट से जुड़ रहे हैं.
भारतीय पारंपरिक युद्धकला को मिल रही नई पहचान
थांग-टा को भारत की प्राचीन युद्धकलाओं में गिना जाता है. मोतिहारी में इस खेल के प्रति बढ़ती दिलचस्पी न केवल युवाओं को आत्मरक्षा के लिए तैयार कर रही है, बल्कि देश की पारंपरिक खेल संस्कृति को भी नई पहचान दिला रही है.
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