नेपाल में जल प्रलय: पूर्वी चंपारण के लिए नेपाल से आने वाला बाढ़ का पानी कोई नई आफत नहीं है. जिले का इतिहास गवाह है कि जब-जब नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश और नदियों में उफान आया, तब-तब चंपारण के कई इलाके तबाही की चपेट में आए. नेपाल के निचले हिस्से में बसे होने के कारण पूर्वी चंपारण को हर साल बाढ़ का खतरा झेलना पड़ता है. इस बार भी जुलाई 2026 में नेपाल में भारी बारिश और पसाह नदी का बांध टूटने की घटना के बाद हालात को लेकर चिंता बढ़ गई है.
1954, 1974 और 1987 की बाढ़ आज भी लोगों को याद
पूर्वी चंपारण के लोगों ने कई विनाशकारी बाढ़ देखी हैं. वर्ष 1954, 1974 और 1987 की बाढ़ को जिले के सबसे भयावह दौरों में गिना जाता है. इन बाढ़ों में बड़े पैमाने पर जान-माल और फसलों को नुकसान हुआ था. कई इलाकों में लंबे समय तक जनजीवन सामान्य नहीं हो सका था.
आज भी पुराने लोग उन बाढ़ के दिनों को याद कर सिहर उठते हैं. हर साल मानसून के दौरान नेपाल से आने वाले पानी को लेकर लोगों की चिंता इसी पुराने अनुभव से जुड़ी रहती है.
2007 और 2017 में टापू जैसे बन गए थे कई इलाके
हाल के वर्षों में 2007 और 2017 की बाढ़ ने भी पूर्वी चंपारण को बुरी तरह प्रभावित किया था. सुगौली, बंजरिया और रक्सौल जैसे इलाकों में पानी भरने से कई क्षेत्र लंबे समय तक चारों ओर से घिरे रहे. सड़क संपर्क बाधित होने के साथ कई जगहों पर आवागमन और रेल परिचालन भी प्रभावित हुआ था.
बाढ़ के कारण ग्रामीण इलाकों के लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने में परेशानी हुई. कृषि क्षेत्र को भी भारी नुकसान पहुंचा था. यही वजह है कि नेपाल में लगातार बारिश की खबर आते ही चंपारण में प्रशासन और आम लोगों की चिंता बढ़ जाती है.
जुलाई 2026 में फिर बढ़ी चिंता
जुलाई 2026 की शुरुआत में नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों में हुई भारी बारिश के बाद पसाह नदी का बांध टूटने की सूचना से सीमावर्ती इलाकों में स्थिति गंभीर हुई. बांध टूटने के बाद पानी तेजी से रिहायशी और कृषि क्षेत्रों की ओर बढ़ा, जिससे कई गांवों में सैकड़ों एकड़ फसल प्रभावित होने की बात सामने आई.
नेपाल की नदियों से आने वाला पानी हर साल किसानों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी करता है. फसल बर्बाद होने के बाद किसानों की आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ता है. लंबे समय से इस समस्या के स्थायी समाधान की मांग उठती रही है.
प्रशासन अलर्ट, अधिकारियों की छुट्टियां रद्द
बाढ़ के पुराने और विनाशकारी इतिहास को देखते हुए जिला प्रशासन इस बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहता. आपदा प्रबंधन विभाग लगातार स्थिति की निगरानी कर रहा है. डीएम सौरभ सुमन यादव ने संबंधित प्रखंड विकास पदाधिकारियों और अंचलाधिकारियों को मुख्यालय में रहने के निर्देश दिए हैं.
तटवर्ती और निचले इलाकों में माइकिंग कर लोगों से सतर्क रहने और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित व ऊंचे स्थानों पर जाने की अपील की जा रही है.
इन 8 प्रखंडों पर सबसे ज्यादा नजर
- सुगौली. नेपाल से आने वाले पानी से अक्सर सबसे पहले प्रभावित होने वाले इलाकों में शामिल.
- रक्सौल. सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण पहाड़ी नदियों के पानी का खतरा.
- अरेराज और संग्रामपुर. गंडक नदी के तटवर्ती इलाके.
- पहाड़पुर और केसरिया. निचले मैदानी क्षेत्र होने से जलभराव की आशंका.
- आदापुर और ढाका. लालबकेया और पसाह नदी के प्रभाव वाले इलाके.
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