हरलाखी.
मिथिला की प्रसिद्ध मध्यमा परिक्रमा यात्रा कल्याणेश्वर मंदिर से संकल्पित होकर शनिवार को फुलहर गिरिजा स्थान पहुंची. भगवान के डोली के साथ-साथ हजारों की संख्या में साधु संत महात्मा भी चल रहे थे. भगवान मिथिला बिहारी व किशोरी जी की डोली फुलहर गिरिजा स्थान पहुंचते ही श्रदालुओं ने पुष्पवर्षा कर भव्य स्वागत किया. इससे पहले रास्ते में दुर्गापट्टी, पिपरौन आदि गांव में महिला श्रद्धालुओं ने हाथ में फूल अक्षत की डाली लेकर भगवान की डोली के इंतजार में कई घंटे तक प्रतीक्षा की. फिर जैसे ही डोली पहुंची सभी ने फूल अक्षत चढ़ाकर भगवान का दर्शन व पूजा की. कलना से लेकर फुलहर तक रास्ते में हजारों की संख्या में लोग दर्शन किया . दोपहर करीब दो बजे भगवान की डोली फुलहर पहुंची. जैसे ही गिरिजा स्थान पहुंची. लोगों ने जयकारे लगाना शुरू कर दिया. फुलहर पहुंचकर साधु महात्माओं ने सबसे पहले भगवान का डोला लेकर गाजे बाजे के साथ बाग तड़ाग पहुंची. फिर पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाराज जनक जी की पुष्प वाटिका में फूललोढ़ी की रस्म पूरी की गयी. उसके बाद उसी फूल से गिरिजा माई की पूजा अर्चना की. फिर भगवान बिहारी व किशोरी जी की डोला को मंदिर परिसर में आसन ग्रहण कराया गया. हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी.किशोरी जी गिरजा माई की पूजा करने रोज आती थी फुलहर
मान्यता है कि जगत जननी माता जानकी नित्य दिन फूल चुनने फुलहर गांव स्थित अपने पिता राजा जनक की फुलबाड़ी जिसे वर्तमान में बाग तड़ाग के नाम से जाना जाता है. उसी पुष्प वाटिका में रोज फूल चुनने आया करती थी. उसी फूल से मां गिरिजा का पूजा करती थी. मान्यता के अनुसार जगत जननी माता सीता और प्रभु श्री राम का पहला मिलन भी इसी पुष्पवाटिका में हुई थी. वाटिका में आज भी भगवान का धनुष इस बात की साक्षी बना हुआ है. इसी परम्परा को बरकरार रखने के लिए प्रत्येक वर्ष भगवान मिथिला बिहारी व किशोरी जी की डोला का मिलन इस पुष्प वाटिका में कराया जाता है.परिक्रमा में ग्रामीणों ने किया समुचित व्यवस्था
मुखिया वीणा देवी, समाजसेवी रंजीत ठाकुर, सहयोगी जितेंद्र साह, झगरू यादव, राजकुमार महतो, उपेन्द्र मुखिया, संतोष मुखिया, मौजे यादव, मिथिलेश सदा, चंदेश्वर राम, चंदन यादव, इंदल मुखिया, रामसेवक महतो, चंद्र किशोर प्रसाद महतो, राज साह, बलराम साह, समेत समस्त ग्रामीणों के सहयोग से महाभंडारा का आयोजन किया था. परिक्रमा महोत्सव को देखने हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे थे. जहां रात भर भजन कीर्तन रामलीला व झांकी समेत अन्य धार्मिक आयोजन से माहौल भक्तिमय बना रहा. अवसर पर सियाराम नाम के जयघोष से पूरा क्षेत्र का माहौल सियाराम मय हो गया. रात्रि विश्राम के बाद भगवान की डोली के साथ परिक्रमा में शामिल श्रद्धालुगण रविवार की सुबह गिरिजा स्थान से अगले पड़ाव नेपाल के मठियानी स्थान के लिए प्रस्थान करेगी.त्रेतायुग से चली आ रही परिक्रमा की परंपरा
पौराणिक मान्यता के अनुसार बाग तड़ाग पुष्प वाटिका के पुजारी बिहारी पांडेय बताते है कि रामायणकाल से ही मध्यमा परिक्रमा की परंपरा चलती आ रही है. त्रेतायुग में जब किशोरी जी व प्रभु श्रीराम की विवाह जनकपुर धाम में हुई थी. उस समय साधु संत व महात्माओं ने पवित्र जनकपुरधाम के चारों दिशाओं में स्थित पंद्रह देव स्थलों की परिक्रमा कर जनकपुर पहुंचे थे. तभी से यह परिक्रमा चलती आ रही है. उन्होंने कहा कि 84 कोस की परिक्रमा यात्रा में शामिल होने से 84 लाख योनियों से उद्धार हो जाता है. इससे सुख समृद्धि व मन की शांति मिलती है.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
