कुव्यवस्था . जगह व कर्मी की कमी से जूझ रहा जिले का शिक्षा विभाग
कर्मियों की कमी से शिक्षा विभाग के ऑफिस वर्षों से जूझ रहे
मधुबनी : जिले भर के छात्रों ,शिक्षकों, अभिभावक शिक्षा विभाग से जुड़े अन्य लोगों और बुद्धिजीवियों को भले ही लगता हो कि जिला मुख्यालय स्थित विभागीय अधिकारीयों के कार्यालय बड़े आलिशान भवन में बेहद सजे होंगे. सुसज्जित तरीके से बाबुओं के आलमीरे में फाइलें रखी होंगी.
लेकिन, ये सब बातें इन दिनों सिर्फ कहने भर के लिए कागजों में दबकर रह गयी है. यहां पहुंचने के बाद यह नहीं लगता कि इसी कार्यालय में बैठकर विभागीय आला अधिकारी और इनके सहायक जिले भर के लाखों छात्राें व शिक्षकों व इनसे जुड़े लोगों का भविष्य तय करते हैं और मुद्दे आने वाली समस्याओं का हल निकालते हैं. इस महकमे के प्राय: सभी ऑफिसों का आलम यह है कि प्रति वर्ष करोड़ों का बारा न्यारा करने वाले इसके अधिकांश कार्यालय किराये के निजी संकीर्ण और जर्जर भवन में चल रहा है जहां अधिकारी और कर्मी किसी तरह फाइलों के बीच बैठकर कार्यों का निष्पादन करते हैं. कर्मियों की कमी से सभी ऑफिस वर्षों से जूझ रहे हैं.
केस एक
पता नहीं चलता है िक ऑफीस है कहां: शहर के जर्जर व नाकाम हो चुके पुराने नगर परिषद भवन में जिले के डीपीओ स्थापना शिक्षा का कार्यालय वर्ष 2014 के अक्टूबर महीने से संचालित किया जा रहा है. ऑफिस शिफ्ट होने के तीन वर्ष बाद भी यहां भवन के बाहर विभाग का एवं अंदर अधिकारी और प्रधान सहायक सहित लिपिकों के बोर्ड नहीं लगाये गये हैं.
जिसके कारण इस कार्यालय से संबंधित किसी आवश्यक कार्य को लेकर बाहर से पहली बार आने वाले शिक्षकों ,जनप्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों एवं अन्य लोगों को यह पता नहीं चल पाता है कि आखिर यह ऑफिस है कहां. दूसरी तरफ इतने वर्ष बाद भी फाइलें जहां तहां अस्त व्यस्त स्थिति में रखी हुयी है.
जिससे यह सहज अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि फर्नीचर में फाइल और बाबू हैं या फाइलों में फर्नीचर और बाबू दबे हुये हैं. जबकि इसी कार्यालय के ऊपर शिक्षा विभाग के हजारों सेवानिवृत एवं कार्यरत नियमित व नियोजित प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षकों एवं जिले भर के विभागीय कर्मियों के सेवाकालीन भविष्य तय करने की जिम्मेवारी है. इस भवन की जर्जरता इतनी अधिक है कि बरसात के दिनों में एक बूंद पानी भी बाहर नहीं निकलता. नाम न छपने की शर्त पर कुछ कर्मियों ने बताया कि यहां बैठकर काम करने में कोई भी कर्मी अपने आपको सुरक्षित नहीं समझते हैं. क्योंकि इससे पूर्व नगर परिषद जर्जरता के कारण ही खाली कर नये भवन में शिफ्ट किया था. यहां स्वीकृत 32 की जगह सिर्फ नौ लिपिक और दस की जगह मात्र चार अनुसेवक कार्यरत हैं.
केस दो
किराये के भवन में चल रहा डीइओ कार्यालय: जिले में शिक्षा विभाग के सबसे बड़े अधिकारी डीइओ के कार्यालय वर्षों से शहर के भूपेंद्र नारायण सिंह कॉलोनी के अंत में एक निजी किराये के भवन में चल रहा है. जिससे नए लोगों के लिए सहज अंदाजा लगा पाना नामुमकिन है कि यह किन्हीं का आवास है या जिला शिक्षा पदाधिकारी का कार्यालय. छोटे छोटे सात कमरों में आठ अलमीरा के भरोसे संचालित इस ऑफिस की स्थिति भी एक जैसी है. यहां कार्य बोझ और फाईलों के बीच कर्मी हमेशा दबे नजर आते हैं.
यहां लिपिकों के स्वीकृत छह पद के बदले पांच और अनुसेवक तीन पद के विरुद्ध दो कार्यरत हैं. इस तरह एक लिपिक, अनुसेवक, स्टेनो और सांख्यिकी पर्यवेक्षक के पद वर्षों से रिक्त हैं. जिससे दैनिक कार्यों के निष्पादन में अधिकारी एवं कर्मियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है.
