गांधीजी की तीनों प्रतिमाएं उपेक्षा की शिकार

मधुबनी : आगामी दो अक्टूबर को जहां पूरा देश गांधी जयंती मना रहा होगा, वहीं जिला के लोग महात्मा गांधी के किस प्रतिमा पर माल्यार्पण करेंगे, इसको लेकर परेशान हैं. सबसे दिलचस्प पहलू तो यह होगा कि जिला प्रशासनिक के अधिकारी इस गांधी जयंती पर किस स्थल पर जाकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रतिमा पर […]

मधुबनी : आगामी दो अक्टूबर को जहां पूरा देश गांधी जयंती मना रहा होगा, वहीं जिला के लोग महात्मा गांधी के किस प्रतिमा पर माल्यार्पण करेंगे, इसको लेकर परेशान हैं.

सबसे दिलचस्प पहलू तो यह होगा कि जिला प्रशासनिक के अधिकारी इस गांधी जयंती पर किस स्थल पर जाकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रतिमा पर माल्यार्पण करेंगे. दसअसल, जिले में एक भी ऐसा प्रतिमा नहीं है जिसे बापू की पूर्ण आदमकद प्रतिमा कहा जाये.

कहीं, बापू के हाथ की लाठी और चश्मा गायब हैं तो कही बापू की प्रतिमा कूड़े के बीच है. ऐसा नहीं कि इस जिला में बापू की प्रतिमा का स्थापना नहीं किया गया था या बापू के प्रतिमा पर माल्यार्पण नहीं किया जा रहा था, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण इस बार आम आदमी से लेकर जिला पदाधिकारी के सामने भी बापू के किस प्रतिमा पर माल्यार्पण हो इसकी समस्या खड़ी हो गयी है.

जो स्थिति बन गयी है उससे अब बापू के तैल चित्र पर ही माल्यार्पण कर जयंती मनाने की प्रक्रिया पूरा किये जाने की संभावना बन गयी है.

गांधी जी का चश्मा गायब
जिले मुख्यालय में ही बापू के तीन विशाल आदमकद प्रतिमाएं बनायी गयी थी. इसमें एक स्टेशन परिसर में आज भी स्थापित है. आम तौर पर हर बड़े कार्यक्रम की शुरुआत बापू के इसी प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ शुरू होती रही है. कई बार जिला पदाधिकारी व कई बड़े मंत्री भी बापू के इस प्रतिमा पर माल्यार्पण कर चुके हैं, लेकिन आज इस प्रतिमा की घोर उपेक्षा की जा रही है.
विगत करीब एक साल से बापू के इस प्रतिमा से बापू का चश्मा गायब है. हाथ में रहने वाला बेत (डंटा) भी किसी ने ले लिया, लेकिन आज तक न तो प्रशासन ने या आम समाजसेवी, राजनीतिक दल या फिर संगठन ने बापू के चश्मा एवं बेंत लगाने की जहमत नहीं की. शायद यह देश भर में बापू का पहला आदमकद प्रतिमा है जिसके आंखों पर न तो चश्मा है और न ही हाथ में लाठी.
कचरे के बीच बापू की प्रतिमा
प्रशासन के अनदेखी का तीसरा उदाहरण शहर के गिलेशन बाजार स्थित बापू की प्रतिमा है. इस प्रतिमा का निर्माण कई बार हंगामा करने के बाद कर तो दिया गया, लेकिन न तो प्रतिमा के ऊपर कोई छतरी का निर्माण किया जा सका और न ही इस जगह पर कचरा न फेंका जाये इसका ही कोई ठोस पहल की जा सकी. लिहाजा बाजार का कचरा आज बापू प्रतिमा के चारों ओर ही फेंका जाता है. आम लोगों की नादानी ने बापू को अपने ही देश में बेगाना जैसी हालत कर दी है.

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