जातीय गोलबंदी के बीच बिजली व सड़क भी मुद्दा

बनेंगे नये समीकरण मधुबनी कभी समाजवादियों और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई का अखाड़ा माना जाता था मधुबनी विधानसभा. 2000 से पहले चार बार कांग्रेस, तो पांच बार समाजवाद का यहां झंडा बुलंद हुआ था. 2000 से लेकर अब तक इस सीट पर भाजपा का कब्जा है. रामदेव महतो चार टर्म से विधायक हैं. इस […]

बनेंगे नये समीकरण

मधुबनी

कभी समाजवादियों और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई का अखाड़ा माना जाता था मधुबनी विधानसभा. 2000 से पहले चार बार कांग्रेस, तो पांच बार समाजवाद का यहां झंडा बुलंद हुआ था. 2000 से लेकर अब तक इस सीट पर भाजपा का कब्जा है. रामदेव महतो चार टर्म से विधायक हैं. इस बार समीकरण बदला हुआ है. 2010 के चुनाव में एनडीए में जदयू शामिल थी, अब वह राजद के साथ है. कांग्रेस भी महागंठबंधन का हिस्सा है. 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को यहां से महज 588 मतों से ही जीत मिली थी. इस बार भी दो धुर विरोधी विधायक रामदेव महतो और राजद के नैयर आजम आमने-सामने होंगे. पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को मधुबनी विधानसभा से भी जीत मिली और निकाय चुनाव में जीत ने पार्टी के आत्म विश्वास को बढ़ा दिया है. दूसरी तरफ, जद यू और कांग्रेस के आने से राजद खेमे में भी उत्साह है.

इन दिनों

एनडीए पंचायत बूथ कमेटी के गठन को अंतिम रूप देने में जुटी है. महागंठबंधन भी पंचायत स्तर पर कार्यकर्ताओं को चुनाव को लेकर तैयार कर रही है.

यहां दिग्गजों में ही जंग

झंझारपुर

झंझारपुर विधानसभा को जिले का सबसे वीआइपी सीट माना जाता है. इसके कारण भी यहां मौजूद हैं. यहां 1972 से लेकर अब तक मिश्र परिवार का दबदबा रहा है. पूर्व मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्र यहां से लगातार पांच बार विधायक हुए. तीन बार मुख्यमंत्री बने. तब उन्होंने कांग्रेस की कमान संभाल रखी थी. उसके बाद इनके पुत्र व पूर्व क बीना मंत्री नीतीश मिश्र यहां लगातार तीन बार से अब तक विधायक हैं. विधायक व मंत्री वे जदयू से हुए, लेकिन अब मांझी गुट में आकर ‘हम’ के जरिये एनडीए के अंग हैं. चुनाव भाजपा से लड़ेंगे या हम से इसका खुलासा होना बाकी है, लेकिन तय है कि ये महागंठबंधन के खिलाफ होंगे. ऐसे में यहां की राजनीतिक समीकरण पलटा मारती दिख रही है. जातीय गोलबंदी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. महादलित वोट का निर्णय सदैव यहां अहम रहा है.

इन दिनों

विधायक के एनडीए में जाने के बाद से महागंठबंधन के दल कार्यक्रमों के जरिये वोटर के बीच उपस्थिति दिखा रहे हैं. भाजपा का चुनाव अभियान रथ घूम रहा है.

पांच साल में तीसरा चुनाव

राजनगर (सु)

1972 के बाद नये परिसीमन में 2010 में यह सीट अस्तित्व में आया. यह सीट समाजवाद की पृष्ठभूमि वाला माना जाता रहा. वैसे कांग्रेस भी यहां से जीत दर्ज कर चुकी है. 2010 के चुनाव में राजद के रामलषण राम रमण जीते थे. लेकिन, लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान उन्होंने जदयू का दामन थाम लिया. फिर मंत्री भी बने. इनके इस्तीफे से खाली हुई सीट के उपचुनाव में जदयू व राजद ने मिलकर चुनाव लड़ा था. इसमें राजद के रामावतार पासवान जीते. इस चुनाव में भी मंत्री रामलषण राम रमण को नेतृत्व करना पड़ा था. भाजपा को यहां लगातार दूसरी बार हार का सामना करना पड़ा. हालांकि, सूबे में महागंठबंधन व एनडीए में नये दलों के शामिल होने से नये राजनीतिक समीकरण के संकेत मिल रहे हैं. 11 माह पहले यहां उप चुनाव हुए थे. फिर से महागंठबंधन व एनडीए आमने-सामने होंगे.

इन दिनों

भाजपा यहां पूरी घेराबंदी की तैयारी में है. चुनाव रथ गांव-गांव घुमाया जा रहा है. वहीं, राजद एक बार फिर चुनाव के लिए कार्यकर्ताओं को रिचार्ज करने में जुटी है.

जातीय गोलबंदी का भरोसा

लौकहा

लौकही विधानसभा में कभी कांग्रेस व वामपंथ में सीधी लड़ाई होती थी, लेकिन 1995 के बाद से हालात बदल गये. दलीय गंठबंधन के साथ यहां जातीय गोलबंदी भी मतदान में असर डालता है. भारत-नेपाल सीमा को छूती यह विधानसभा वैसे तो हाल के दिनों तक काफी पिछड़ा इलाके में शुमार था, लेकिन अब स्थिति बदली है. अक्तूबर, 2005 से एक ही परिवार के पास है. साल 2011 में पूर्व मंत्री हरि प्रसाद साह की मौत के बाद हुए उपचुनाव में जदयू के टिकट पर उनके पुत्र सतीश कुमार साह जीते. सतीश को स्व. साह से 16 हजार अधिक मत मिले थे. पर यहां राजद के वोट में भी इजाफा हुआ था. तब राजद व जदयू ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. अब दोनों साथ हैं तो जाहिर है कि वे अपनी स्थिति बेहतर मान रहे हैं. लेकिन, एनडीए ने भी यहां अपनी सक्रियता तेज कर रखी है. भाजपा के साथ हम के नेता-कार्यकर्ता दौरा कर रहे हैं.

इन दिनों

जदयू का हर घर दस्तक कार्यक्रम जोरशोर से चल रहा है. वहीं, भाजपा बूथ कमेटी बना रही है. भाजपा का चुनाव रथ भी क्षेत्र में घूम रहा है.

जीते-हारे नेता एक नाव पर

बाबूबरही

कभी जिले में समाजवाद की आवाज बाबूबरही की धरती से ही उठती थी. यही कारण रहा कि एक जमाने में कांग्रेस को यहां समाजवादियों से कड़ी टक्कर मिलती रही थी, लेकिन अब हालात बदल गये हैं. 2010 के चुनाव में राजद के उमाकांत यादव ने एनडीए की लहर के बाद भी जदयू को हराया था. हालांकि, जीत का अंतर पांच हजार के नीचे रहा था, लेकिन यह जीत उस समय कई मायनों में महत्व रखती थी. अब तो जीते व हारे दोनों नेता एक नाव पर सवार हैं. साथ ही कांग्रेस भी साथ है. एनडीए के सामने सबसे बड़ी चुनौती कद्दावर उम्मीदवार को लेकर है. बाबूबरही विधानसभा की भौगोलिक सीमा नेपाल को छूती है. विकास यहां के लिए हर बार मुद्दा बनता है, लेकिन चुनाव में जातीय गोलबंदी इस मुद्दे की हर बार हवा निकाल देती है. महागंठबंधन के तीनों दल अपने-अपने कार्यकर्ताओं की गोलबंदी में जुटे हैं.

इन दिनों

राजद, जदयू व कांग्रेस पंचायत स्तर पर कार्यकर्ता सम्मेलन कर कर रहे हैं. वहीं, एनडीए का चुनाव रथ घूम रहा है. भाजपा ने बूथ कमेटी बना ली है.

कभी था वामपंथ का गढ़

हरलाखी

एक जमाना था, जब हरलाखी को भाकपा का फ्लैग लैंड कहा जाता था. 1951 के बाद छह बार सीपीआइ ने यहां जीत दर्ज की. वहीं, कांग्रेस भी छह बार जीती. 2005 से पहले तक कांग्रेस और सीपीआइ में बराबरी का मुकाबला होता रहा, लेकिन 2005 के बाद हालात बदले. 2010 में जदयू के शालीग्राम यादव ने जीत दर्ज की. उस समय जदयू एनडीए का अंग था और राजद-कांग्रेस अलग चुनाव लड़ी थी. यहां हर चुनाव में जातीय गोलबंदी चुनावी समीकरण पर असर डालती है. हालांकि नये राजनीतिक गंठबंधनों से यहां के समीकरण भी बदलते नजर आ रहे हैं. इस बार महागंठबंधन में जदयू व कांग्रेस शामिल है. तो एनडीए में लोजपा, रालोसपा व हम के शामिल होने से जातीय समीकरण बदलता दिख रहा है. वैसे इलाके में विकास बड़ा मुद्दा है और एनडीए इसे लेकर जद यू को घेरने की रणनीति बना रहा है.

इन दिनों

जदयू का हर घर दस्तक कार्यक्रम जारी है. राजद पंचायत स्तर पर कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में लगा है. एनडीए का चुनाव रथ प्रवेश कर गया है.

भाइयों के बीच जंग का मैदान

फुलपरास

फुलपरास विधानसभा एक ही राजनीतिक परिवार के विरोधियों के अखाड़ा के रूप में चर्चित है. पिछले चार चुनावों में भाइयों के बीच जंग होती रही है. वर्तमान विधायक गुलजार देवी के पति देवनाथ यादव और पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेंद्र प्रसाद यादव ही केंद्र में होते हैं. दोनों एक ही परिवार के हैं. हालांकि यहां झंडा समाजवाद का ही लहराता रहा है. सिर्फ पांच बार कांग्रेस की जीत हुई थी. कांग्रेस की अंतिम जीत 1995 में हुई और देवनाथ यादव पार्टी के प्रत्याशी थे. इस बार हालात बदलते दिख रहे हैं. देवनाथ यादव फिलहाल जदयू में हैं और इनकी पत्नी गुलजार देवी यहां से विधायक हैं. वहीं देवेंद्र प्रसाद यादव ने ‘हम’ का दामन थाम लिया है और एनडीए का अंग हैं. वहीं इन दोनों के एक और चचेरे भाई उपेंद्र यादव भाजपा में हैं. भाइयों में ही कुरसी की जंग को लेकर यह विधानसभा क्षेत्र चर्चा में होता है. इस बार भी माजरा कुछ ऐसा ही है.

इन दिनों

भाजपा पूरी तैयारी में जुटी हुई है. फोरलेन के बगल में होने के कारण सभी दल के बड़े नेता आते-जाते हैं. जदयू का हर घर दस्तक कार्यक्रम जारी है.

हर बार स्थानीय राजनीति हावी

खजौली

खजौली की तसवीर सबसे अलग रही है. कभी कांग्रेस और भाकपा के बीच चुनावी जंग होती थी, लेकिन पिछले तीन चुनावों में भाजपा की जीत होती रही है. साल 2010 से पूर्व यह सुरक्षित सीट थी. हर चुनाव में यहां पहले विकास अहम मुद्दा होकर उठता है, लेकिन मतदान से ठीक कुछ पहले यहां की तसवीर जातीय समीकरण में उलझ जाती है और विकास का मुद्दा गौण हो जाता है. यही वजह है कि हर राजनीतिक दल यहां दलीय समीकरण के साथ-साथ जातीय समीकरण को साधना चाहते हैं. वर्तमान विधायक अरुण शंकर प्रसाद विकास का दावा करते हैं तो विरोधी दावे का प्रमाण मांगते हैं. वहीं, महागंठबंधन और एनडीए का नया राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण हो गया है, जिस पर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है. दरअसल, यहां स्थानीय राजनीति हर चुनाव में हावी रही है.

इन दिनों

एनडीए का चुनाव अभियान रथ घूम रहा है. भाजपा पंचायत स्तर पर कार्यकर्ता सम्मेलन कर चुकी है. महागंठबंधन के सभी दल चुनावी रणनीति बनाने में जुटे

सीट तय होने का इंतजार

बेनीपट्टी

कभी कांग्रेस और वामपंथ का गढ़ माने जाने वाले बेनीपट्टी में पहली बार 2010 में भाजपा जीती थी. जीत का अंतर काफी बड़ा था. उस समय दूसरे नंबर पर लोजपा रही थी जिसे राजद का साथ मिला था. अब लोजपा एनडीए का अंग है. हालांकि कांग्रेस अलग चुनाव लड़ी और उसके प्रत्याशी को 13 हजार से अधिक मत हासिल हुआ था. अब कांग्रेस महागंठबंधन में शामिल है. ऐसे में यहां का राजनीतिक समीकरण बदला हुआ है. इस बदले समीकरण में महागंठबंधन मैदान में किसे उतारती है, यह महत्वपूर्ण होगा. बताया जाता है कि कांग्रेस इस सीट पर अपनी दावेदारी दे रही है. हालांकि जदयू भी इस सीट पर अपना दावा पेश करेगा. दरअसल, अक्तूबर 2005 में जदयू के शालीग्राम यादव चुनाव जीते थे. उस समय नीतीश कुमार और एनडीए के पक्ष में लहर था. ऐसे में यहां चुनाव के दौरान क्या होगा, यह पार्टियों से ज्यादा यहां के वोटरों की रणनीति पर निर्भर करेगा.

इन दिनों

महागंठबंधन अपने नये समीकरण को जोड़ने में जुटी है. पंचायत स्तर पर कार्यकर्ताओं की कमेटी बनायी जा रही है. एनडीए का चुनाव अभियान शुरू है.

धुर विरोधी एक मंच पर

बिस्फी

2010 के मुकाबले इस बार के विधानसभा चुनाव में वोट का समीकरण भी अलग होगा और चेहरे भी. गंठबंधन की राजनीति की विवशता ने इस बार पिछले विधानसभा चुनाव के दो धुर विरोधी को एक साथ खड़ा कर सकती है. निकाय चुनाव में तो ऐसी ही तसवीर देखने को मिली है. यहां दिलचस्प यह भी रहा है कि माय समीकरण में एकता कभी नहीं रही. यही कारण रहा कि फरवरी 2005 और अक्तूबर 2005 में हरिभूषण ठाकुर बचौल निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीते थे. हालांकि 2010 में जदयू के टिकट पर चुनाव लड़े तो उनकी हार हुई. राजद के डॉ फैयाज अहमद जीते. तब राजद-कांग्रेस अलग लड़ी थी और भाजपा जदयू साथ थी. अब महागंठबंधन में जदयू शामिल है. पिछले चुनाव में राजद के साथ रही लोजपा इस बार एनडीए का अंग है. महागंठबंधन की ओर से राजद के विधायक डॉ फैयाज अहमद प्रत्याशी होंगे. एनडीए में यह सीट लोजपा को देने के संकेत मिल रहे हैं.

इन दिनों

स्थानीय स्तर पर समीकरण बनाने की तैयारी हो रही है. एनडीए की ओर से भी कार्यक्रम हो रहे हैं. मुद्दे जुटाये जा रहे हैं, ताकि राजद-जद यू को घेरा जा सके.

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