रात में विद्यालय व सड़क बना लोगों का पनाहगार
साहरघाट : दुखिया के दु:ख स भगवानो डरैत छथि. अबले पर भगवान भूकंपक कहर बरपबै छथि. करीब तीन बजे सुबहे में लोग फेनू चिचियाये लागल कि भागू! भागू! फेर आबि गेल भूकंप. भूकंप के भय स राइत भर सभ बाल बच्चा के कांखि तर पजियौने कहूना क पहर गुजारय पड़ल अछि.
मंगलक राइत मुदा खरमंगल नै भय जाये ताहि लेल हमहूं धिया पूता के डेंगियने बदहवास भगलंउ, मूदा बेर-बेर खसि पड़लौं. तखन स भोर धरि जानक रक्षा लेल सड़कें पर बैसल रहि गेलंउ. यह करुण गाथा मधवापुर प्रखंड क्षेत्र के मुखियापट्टी निवासी मोसमात बबिता देवी की है, जो पिछले तीन साल पहले असमय में ही विधवा हो गयी, लेकिन विधि का खेल ऐसा कि अपने चार छोटे बच्चों के साथ पहाड़ जैसा जीवन काटती बबीता के लिए मंगलवार का दिन खरमंगल बन गया.
एक ओर जहां दिन में आये भूकंप में उसके घर की मिट्टी की दीवार चरचराकर गिर पड़ी. वहीं, रात में भी जान बचाने के लिए इधर-उधर बदहवास भागती रही. थक हार कर अपने बच्चों के साथ सड़कों पर ही बैठकर रात गुजारी.
बता दें कि बबीता के पति देवेंद्र झा की मौत बीमारी की वजह से तीन साल पहले हो गयी थी. कम उम्र में ही विधवा हो गयी, लेकिन अब तक उसे न तो विधवा पेंशन मिला न ही कोई सरकारी सहायता ही मिल सकी है.
यह हाल केवल बबीता की ही नहीं, बल्कि प्रखंड में सैकड़ों ऐसे लोगों की है, जो रात भर रतजगा करके ही गुजारे. रामनगर निवासी विकलांग लक्ष्मण यादव कहते हैं कि भूकंप के भय से गांव के अधिकांश लोग पास स्थित प्राथमिक विद्यालय के परिसर में मोमबत्ती की रोशनी के सहारे गुजारे.
वहीं, रात के अंधेरे में मध्य विद्यालय मुखियापट्टी और पंचायत कार्यालय परिसर लोगों का शरणस्थली बना रहा. बार-बार भूकंप आने की खबरों से लोग हलकान रहे. लोग अब भूकंप के बार बार आ रहे झटके से इस कदर उब चुके हैं कि लोग कहने लगे हैं कि इससे बेहतर है कि भगवान एक ही बार में सब को अपने पास बुला ले.
