30 हजार पशु बीमारी से आक्रांत

हड़कंप : जिले के पशुओं में डेगनाला बीमारी का प्रकोप मधुबनी : पशुपालकों सावधान! आपके पशुओं के उपर अब एक नयी बीमारी का खतरा मंडरा रहा है. खुरमुहपका रोग की तरह ही पशुओं के लिए डेगनाला नामक एक एक नयी बीमारी का प्रकोप तेजी से फैल रहा है. विभाग से मिली जानकारी के अनुसार डेगनाला […]

हड़कंप : जिले के पशुओं में डेगनाला बीमारी का प्रकोप

मधुबनी : पशुपालकों सावधान! आपके पशुओं के उपर अब एक नयी बीमारी का खतरा मंडरा रहा है. खुरमुहपका रोग की तरह ही पशुओं के लिए डेगनाला नामक एक एक नयी बीमारी का प्रकोप तेजी से फैल रहा है. विभाग से मिली जानकारी के अनुसार डेगनाला रोग से जिला में 30 हजार पशु आक्रांत है. जिसमें 20 हजार भैंस एवं दस हजार में गाय, बैल एवं अन्य पशु है.

क्या है लक्षण

डेगनाला बीमारी भी खुरमुहपका के तरह ही होता है. इस बीमारी में सबसे पहले पशु का पैर, पूंछ, थन, कान एवं जीभ में घाव होता है. यह बीमारी महज 24 से 48 घंटा में पशु को अपने आगोस में ले लेता है. इस बीमारी में सबसे पहले पशु के जीभ सड़ने लगता है. इसके बाद पैर सहित अन्य जगहों पर घाव का फैलना शुरू हो जाता है. पशु चिकित्सकों का कहना है कि डेगनाला बीमारी एक प्रकार के कुष्ट रोग की तरह ही होता है. जो पशुओं में यह बहुत तेजी से फैलता है.

कैसे होती है बीमारी

पशुपालन विभाग के डा. सुभाष चंद्र प्रसाद सिंह ने बताया कि डेगनाला बिमारी 1930 ई में सबसे पहले पंजाब में देखा गया था. उस समय यह बीमारी के रोक थाम के लिए वहां के लोगों ने जंगली दवा का व्यवहार कर तत्काल उस बीमारी पर रोक लगाया था. उसके बाद यह बीमारी सामान्यत: नहीं देखा गया. डेगनाला रोग सामान्यत: पुराने या गले पुआल खाने से होता है. यह बीमारी सबसे ज्यादा भैंस में होता है.

बचने का उपाय

डेगनाला बीमारी के लिए अभी तक वैसे कोई खास टीका नहीं निकला है. शुरू में ही अगर किसान अपने पशु को डायकेष्टासीन एवं प्रोकेन पेंसीलिंग दवा देना शुरू कर दे तो बीमारी पर काबू पाया जा सकता है. डा. सुभाष चंद्र प्रसाद सिंह ने बताया कि ग्रामीण इलाका के किसान इस रोग को खुरमुहपका समझ कर एफएमडी टिका लगवा देते हैं. पर एफएमडी टिका इस रोग के लिए नहीं है. इस बीमारी से बचने के लिए किसान को मवेशी के घाव पर पोटाशियम परमैगनेट हल्दी, कपूर को नारियल तेल में मिला कर लगाने से भी इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है.

दवा नहीं है उपलब्ध

डा. सुभाष चंद्र प्रसाद सिंह ने बताया की इस बीमारी से बचने के लिए अभी तक कोई दवा नहीं आया है. वही इनका कहना था कि इस बीमारी से बचने के लिए सरकार रिसर्च करवा कर इसका दवा उपलब्ध करावे नहीं तो आने वाले समय में यह पशुओं के लिए घातक सिद्ध होगा.

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