मधेपुरा: सदर अस्पताल में बिजली गुल होते ही छाया अंधेरा, मोबाइल की फ्लैश लाइट में हुआ मरीजों का इलाज; व्यवस्था पर उठे सवाल

मधेपुरा के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में बिजली गुल होने से अंधेरा छा गया. डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को मरीजों का इलाज करने के लिए मोबाइल की टॉर्च का सहारा लेना पड़ा. इस घटना ने अस्पताल की आपातकालीन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

मधेपुरा जिले के सबसे बड़े सरकारी स्वास्थ्य केंद्र 'सदर अस्पताल' से स्वास्थ्य व्यवस्था की कलई खोलने वाली तस्वीर सामने आई है. अस्पताल में विद्युत आपूर्ति बाधित होते ही वार्डों में घना अंधेरा छा गया, जिसके बाद मजबूरन डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को मरीजों की जांच व इलाज के लिए अपने मोबाइल फोन की फ्लैश लाइट का सहारा लेना पड़ा. अंधेरे में मोबाइल की रोशनी के सहारे ड्रिप लगाने, इंजेक्शन देने और इलाज करने की तस्वीरें सामने आने के बाद अस्पताल के पावर बैकअप और आपातकालीन प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.

अंधेरा होते ही मोबाइल बना रोशनी का सहारा

सामने आई तस्वीरों में अस्पताल परिसर और वार्डों में गहरा अंधेरा दिखाई दे रहा है. मरीजों के बेड के पास खड़े स्वास्थ्यकर्मी और तीमारदार एक हाथ में मोबाइल की फ्लैश लाइट जलाकर रोशनी करते और दूसरे हाथ से उपचार करते नजर आए. यह स्थिति साफ दर्शाती है कि बिजली कटने के बाद अस्पताल में वैकल्पिक रोशनी की कोई त्वरित और स्वचालित व्यवस्था क्रियाशील नहीं थी. गंभीर मरीजों के लिए कुछ सेकंड की देरी या अंधेरे में गलत नस में इंजेक्शन लगना जानलेवा साबित हो सकता है.

बैकअप सिस्टम और जनरेटर पर उठे गंभीर सवाल

सरकारी गाइडलाइन के अनुसार सदर अस्पताल जैसे संवेदनशील और 24 घंटे संचालित स्वास्थ्य संस्थानों में निर्बाध बिजली आपूर्ति अनिवार्य है.

बिजली जाने के तुरंत बाद ऑटो-स्विच जनरेटर या इन्वर्टर बैकअप सिस्टम चालू होना चाहिए. घटना के बाद यह सवाल उठ रहा है कि:

  • बिजली कटने के बाद स्वचालित जनरेटर तुरंत शुरू क्यों नहीं हुआ?
  • क्या अस्पताल का बैकअप सिस्टम खराब था या ईंधन की कमी थी?
  • इमरजेंसी जैसे अति-संवेदनशील वार्ड में वैकल्पिक रोशनी शुरू करने की जिम्मेदारी किसकी थी?

इमरजेंसी वार्ड में बढ़ जाता है खतरे का दायरा

सामान्य वार्डों की तुलना में इमरजेंसी वार्ड में ऐसी लापरवाही किसी बड़े हादसे का सबब बन सकती है. इमरजेंसी में गंभीर रूप से घायल, अत्यधिक रक्तस्राव वाले या सांस की तकलीफ से जूझ रहे मरीज भर्ती होते हैं. ऐसे में चिकित्सकों को तत्काल और स्पष्ट रोशनी में घाव की सिलाई, ड्रेसिंग और दवाएं देनी होती हैं. मोबाइल की सीमित रोशनी में काम करना स्वास्थ्यकर्मियों के लिए जोखिम भरा है और इससे इलाज की गुणवत्ता सीधे प्रभावित होती है.

गरीब मरीजों की उम्मीदों पर फिर रहा पानी, परिजनों में रोष

इलाज कराने आए तीमारदारों ने अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ कड़ा आक्रोश व्यक्त किया है. परिजनों का कहना है कि निजी अस्पतालों का भारी खर्च उठाने में असमर्थ गरीब और ग्रामीण जनता पूरी तरह सरकारी सदर अस्पताल पर निर्भर रहती है. यदि सरकारी तंत्र में रोशनी जैसी मूलभूत सुविधा के लिए भी मोबाइल की फ्लैश जलानी पड़े, तो यह प्रशासनिक लापरवाही की पराकाष्ठा है.

बिहार के अन्य अस्पतालों में भी आ चुकी हैं ऐसी तस्वीरें

यह कोई पहला मामला नहीं है जब सरकारी अस्पताल में टॉर्च या मोबाइल की रोशनी में इलाज की बात सामने आई हो. इससे पहले अगस्त 2026 में सासाराम मॉडल सदर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड और मधुबनी सदर अस्पताल में भी बिजली गुल होने के बाद मोबाइल की रोशनी में इलाज करने के मामले उजागर हो चुके हैं. स्थानीय लोगों और बुद्धिजीवियों ने मांग की है कि आईसीयू, प्रसव कक्ष, ऑपरेशन थिएटर और इमरजेंसी वार्ड के पावर बैकअप की दैनिक जांच की जाए और संबंधित लापरवाह कर्मियों पर सख्त कार्रवाई हो.


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लेखक के बारे में

By कुमार आशीष

कुमार आशीष 15 वर्षों से प्रभात खबर समूह के साथ पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली से जनसंचार में डिग्री प्राप्त करने के बाद इन्होंने राजनीति, अपराध और कोसी अंचल की रिपोर्टिंग में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पिछले पांच वर्षों से सक्रिय हैं. पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए इन्हें नेपाल में 'अंतरराष्ट्रीय मैथिली युवा पत्रकारिता सम्मान' से नवाजा जा चुका है.

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