Madhushravani 2026 : मिथिलांचल की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक मधुश्रावणी पर्व नवविवाहिताओं के लिए बेहद खास माना जाता है. यह पर्व विवाह के बाद पहले सावन में मनाया जाता है, जिसमें महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु के लिए विशेष व्रत रखती हैं. इस दौरान व्रती महिलाएं बिना नमक का अथवा अरवा भोजन ग्रहण करती हैं और पूरे विधि-विधान से भगवान शिव, माता गौरी तथा नाग देवता की आराधना करती हैं.
मैना के पत्तों की सजावट से दिखी उत्सव की रौनक
पर्व की शुरुआत से पहले रविवार को नवविवाहिताओं के ससुराल में उत्सवी माहौल देखने को मिला. बड़ी संख्या में महिलाओं ने पूजा में उपयोग होने वाले मैना के बड़े-बड़े पत्तों को सिंदूर, पीठार, काजल और हल्दी से आकर्षक ढंग से सजाया. वहीं वधू पक्ष के घर चूड़ा, केला, दही, मिठाई, श्रृंगार सामग्री और पारंपरिक पकवान सहित पूजा की अन्य आवश्यक सामग्री भेजी गई.
15 दिनों तक चलेगा पूजा और कथा श्रवण का क्रम
आज से शुरू होने वाले इस पर्व में नवविवाहित महिलाएं अपनी सखी-सहेलियों के साथ प्रतिदिन गांव और आसपास के क्षेत्रों में जाकर पूजा के लिए फूल-पत्तियां एकत्र करेंगी. इसके बाद भगवान शिव-पार्वती, नाग-नागिन और राम-सीता की कथा सुनते हुए नियमित पूजा-अर्चना करेंगी. पूरे पर्व के दौरान धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाएगा.
'टेमी दागने' की रस्म होती है सबसे खास
मधुश्रावणी पर्व का सबसे महत्वपूर्ण और पारंपरिक अनुष्ठान अंतिम दिन होने वाली 'टेमी दागने' की रस्म मानी जाती है. इसे प्रतीकात्मक अग्निपरीक्षा के रूप में देखा जाता है, जो नवविवाहिता के धैर्य, आस्था और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना का प्रतीक है. वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी मिथिलांचल के कई क्षेत्रों में पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जाती है.
लोक संस्कृति को जीवंत रखने वाला पर्व
मधुश्रावणी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मिथिलांचल की समृद्ध लोक संस्कृति, पारिवारिक परंपराओं और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है. यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का माध्यम बनता है और परिवारों में प्रेम, आस्था तथा परंपराओं के संरक्षण का संदेश देता है.
